महिला आरक्षण विधेयक को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। महिला कांग्रेस की अध्यक्ष व पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती सीमा अनंत ने केंद्र की भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि जब देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे थे और आचार संहिता लागू थी, उसी समय लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक लाया जाना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था।
सीमा अनंत ने आरोप लगाया कि सरकार ने अपने पार्टी और घटक दलों के सांसदों को व्हिप जारी कर अनिवार्य उपस्थिति सुनिश्चित की, जिससे यह संदेश दिया जा सके कि भाजपा महिलाओं की सबसे बड़ी हितैषी है। उनका कहना है कि सरकार जानती थी कि विधेयक को परिसीमन और जनगणना से जोड़ने के कारण तत्काल लागू नहीं किया जा सकेगा, फिर भी इसे राजनीतिक लाभ के लिए प्रस्तुत किया गया।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2023 में महिला आरक्षण विधेयक सर्वसम्मति से पारित हो चुका है और कांग्रेस सहित सभी दलों ने उसका समर्थन किया था। इसके बावजूद अब तक इसे लागू नहीं किया गया। सीमा अनंत के अनुसार, सरकार एक्ट 334A का हवाला देते हुए कह रही है कि 2026 की जनगणना और परिसीमन के बाद ही आरक्षण लागू होगा। इससे स्पष्ट होता है कि केंद्र सरकार महिलाओं को तत्काल आरक्षण देने की इच्छुक नहीं है।
सीमा अनंत ने यह भी कहा कि पहले सरकार 2026 की जनगणना के आंकड़ों की बात करती रही, लेकिन अब 2011 की जनगणना के आधार पर आरक्षण लागू करने की बात सामने आ रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि 2011 के आंकड़ों को आधार बनाया जा सकता है तो वर्तमान लोकसभा की 543 सीटों के आधार पर महिलाओं को आरक्षण क्यों नहीं दिया जा रहा?
उनका आरोप है कि यदि विधेयक पास होता है तो भाजपा इसका श्रेय लेने की कोशिश करती है, और यदि लागू नहीं होता तो विपक्ष को महिला विरोधी बताकर राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास किया जाता है।
सीमा अनंत ने मांग की कि पारित महिला आरक्षण कानून को बिना किसी देरी के तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए, ताकि देश की महिलाओं को उनका संवैधानिक अधिकार मिल सके। महिला आरक्षण को लेकर अब सियासत और तेज होने के संकेत मिल