जिले का मत्स्य पालन विभाग इन दिनों कार्यशैली को लेकर लगातार सवालों के घेरे में है। कार्यालय का नियमित समय पर नहीं खुलना, विभागीय कर्मियों की लापरवाही और शराब सेवन जैसी गतिविधियों की फोटो-वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होना विभाग की साख को चोट पहुँचा रहा है।
वर्तमान में प्रदेश में मत्स्य प्रजनन संरक्षण अवधि (Breeding Season Ban) के तहत मछलियों के शिकार एवं विक्रय पर पूर्ण प्रतिबंध लागू है, जो हर वर्ष 15 जून से 15 अगस्त तक प्रभावशील रहता है। इसके बावजूद जिले के स्थानीय बाजारों में अंडा वाली मछलियों की खुलेआम बिक्री देखी जा रही है। इतना ही नहीं, केंद्र सरकार द्वारा प्रतिबंधित मांगुर (African Catfish) और बिग्रेड (Hybrid/Genetically Modified Fishes) जैसी प्रजातियों को खुलेआम पाला और बेचा जा रहा है, जो न केवल जैव विविधता के लिए खतरा है, बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी गंभीर दुष्परिणाम डाल सकता है।
विज्ञान एवं पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, मांगुर मछली की खेती से जलाशयों में ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है और यह अन्य मछलियों की प्रजातियों को समाप्त कर देती है। साथ ही, इन मछलियों को कृत्रिम हार्मोन से तेजी से बढ़ाया जाता है, जो मानव उपभोग के लिए स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद हानिकारक है।
केंद्र सरकार के मत्स्य पालन निर्देशिका और जल जीव संरक्षण अधिनियम के तहत प्रतिबंधित प्रजातियों का पालन, विक्रय और संग्रह एक दंडनीय अपराध है, जिसमें 3 साल तक की सजा और जुर्माना का प्रावधान है। इसके बावजूद, कबीरधाम जिले में विभाग द्वारा अब तक एक भी सख्त कार्यवाही नहीं की गई है।
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने इस पर कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। यदि शीघ्र ही सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो जिले की जैव विविधता और मत्स्य व्यवसाय पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।