कवर्धा l पंडरिया नगर के हृदय स्थल पर आम जनता को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने और शहर को नया व्यावसायिक एवं मनोरंजन केंद्र देने के उद्देश्य से लाखों रुपये की लागत से सर्वसुविधायुक्त चौपाटी का निर्माण कराया गया था। इस महत्वाकांक्षी परियोजना का लोकार्पण प्रदेश के उप मुख्यमंत्री श्री अरुण साव के हाथों कराया गया। उस समय बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि यह चौपाटी पंडरिया नगर की नई पहचान बनेगी, स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे और नगर के विकास को नई दिशा मिलेगी। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि यह चौपाटी अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाती नजर आ रही है।

लोकार्पण के बाद कुछ समय तक यह परियोजना चर्चा में रही, लेकिन धीरे-धीरे जिम्मेदारों की उदासीनता के कारण चौपाटी की चमक फीकी पड़ने लगी। वर्तमान स्थिति यह है कि लाखों रुपये खर्च कर तैयार की गई यह सार्वजनिक परिसंपत्ति उपयोग के अभाव में कबाड़ में तब्दील होती जा रही है। चौपाटी परिसर में बनाए गए दुकानों के संचालन के लिए नगर पालिका परिषद द्वारा दो बार नीलामी प्रक्रिया आयोजित की गई, लेकिन दोनों ही बार कोई खास प्रतिसाद नहीं मिला। नतीजतन अधिकांश दुकानें आज भी खाली पड़ी हैं और उन पर ताले लटक रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब दुकानों के लिए व्यापारिक संभावना और मांग का उचित आकलन नहीं किया गया था तो आखिर इतने बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य क्यों कराया गया? यदि दो बार नीलामी के बाद भी कोई दुकानदार आगे नहीं आया तो यह योजना निर्माण की प्रक्रिया और उसकी व्यवहारिकता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। नगरवासियों का कहना है कि बिना ठोस योजना और बाजार की जरूरत को समझे हुए किए गए निर्माण कार्यों का परिणाम अक्सर इसी प्रकार सामने आता है।
चौपाटी की बदहाली केवल खाली दुकानों तक सीमित नहीं है। परिसर को आकर्षक बनाने और हरियाली बढ़ाने के उद्देश्य से लगाए गए पौधे भी अब देखरेख के अभाव में सूखने लगे हैं। कई पौधे पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं, जबकि शेष पौधे भी पानी और संरक्षण के अभाव में मुरझाने की स्थिति में पहुंच गए हैं। जिस स्थान को शहर का आकर्षण केंद्र बनाया जाना था, वहां अब उपेक्षा और लापरवाही साफ दिखाई देती है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि विकास कार्यों में लाखों रुपये खर्च करने के बाद जिम्मेदार विभागों द्वारा उनके रखरखाव पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। निर्माण कार्य पूर्ण होने और लोकार्पण संपन्न होते ही परियोजनाओं को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। यही कारण है कि जनता के टैक्स के पैसे से तैयार की गई परिसंपत्तियां कुछ ही वर्षों में अपनी उपयोगिता खोने लगती हैं।






