उप वनमंडल पंडरिया के पूर्व परिक्षेत्र अंतर्गत कक्ष क्रमांक 511, कामठी में पकड़ी गई सागौन तस्करी की घटना ने वन विभाग की निगरानी व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। जंगलों की सुरक्षा के लिए बनाए गए वन बैरियर, गश्ती दल और चौकसी व्यवस्था उस समय सवालों के घेरे में आ गई, जब बहुमूल्य सागौन से भरा वाहन रहमानकापा और मैनपुरा वन बैरियर पार करते हुए रेहुटा तक पहुंच गया, लेकिन वन विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि पूरे मामले का खुलासा वन विभाग ने नहीं, बल्कि डायल-112 की सतर्कता से हुआ।
जानकारी के अनुसार डायल-112 की टीम ने संदिग्ध वाहन को पकड़कर वन विभाग को सूचना दी। इसके बाद वन विभाग पंडरिया पश्चिम, पंडरिया पूर्व तथा वन विकास निगम पंडरिया के अधिकारी और कर्मचारी मौके पर पहुंचे। पंडरिया पश्चिम के परिक्षेत्र अधिकारी के मार्गदर्शन में कार्रवाई करते हुए 38 नग सागौन लठ्ठा, 5 नग आरा तथा 1 नग तलवार जब्त कर वन अपराध का प्रकरण दर्ज किया गया। विभाग ने मामले की जांच जारी होने की बात कही है।
यह घटना कई गंभीर सवाल छोड़ गई है। यदि जंगलों से निकलने वाला वाहन दो-दो वन बैरियर पार कर सकता है, तो उन बैरियरों का उद्देश्य क्या है। क्या वहां वाहनों की जांच नहीं होती या फिर जांच केवल कागजों तक सीमित है? यदि डायल-112 सक्रियता नहीं दिखाता, तो क्या यह बहुमूल्य लकड़ी आसानी से अपने ठिकाने तक पहुंच जाती?
सबसे चौंकाने वाला तथ्य जब्त सामग्री में एक तलवार का मिलना है। इससे साफ संकेत मिलता है कि वन माफिया अब केवल चोरी-छिपे नहीं, बल्कि हथियारों के साथ जंगलों में सक्रिय हैं। तलवार की बरामदगी यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर तस्करों को हथियार लेकर चलने की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या उन्हें कानून का भय नहीं रहा? क्या वे वन अमले या किसी विरोध का सामना करने की तैयारी से निकलते हैं? यह स्थिति वन विभाग की सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी मानी जा रही है।
वन विभाग हर वर्ष वन सुरक्षा, गश्ती, बैरियर संचालन और अवैध कटाई रोकने के लिए बड़ी राशि खर्च करता है। इसके बावजूद यदि सागौन जैसी बहुमूल्य लकड़ी बिना रोक-टोक बैरियर पार कर जाती है, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि पूरे निगरानी तंत्र की विफलता को दर्शाता है। स्थानीय लोगों का भी कहना है कि क्षेत्र में लकड़ी तस्करी की शिकायतें पहले भी सामने आती रही हैं, लेकिन प्रभावी कार्रवाई के अभाव में तस्करों के हौसले लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
इस पूरे मामले में केवल लकड़ी जब्त करना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि वाहन किन रास्तों से निकला, बैरियरों पर उस समय कौन कर्मचारी ड्यूटी पर थे, वाहन की जांच क्यों नहीं हुई और क्या इस पूरे घटनाक्रम में किसी स्तर पर गंभीर लापरवाही या मिलीभगत रही है। यदि जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय नहीं हुई, तो ऐसी घटनाएं भविष्य में भी दोहराई जाती रहेंगी।
वन विभाग ने जांच जारी होने की बात कही है, लेकिन अब जनता की निगाह इस बात पर है कि जांच का दायरा केवल तस्करों तक सीमित रहेगा या फिर वन बैरियरों की कार्यप्रणाली और वहां तैनात कर्मचारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होगी। क्योंकि जब वन माफिया 38 सागौन लठ्ठे, 5 आरा और तलवार के साथ बेखौफ घूमते हुए दो-दो वन बैरियर पार कर जाएं और विभाग को इसकी जानकारी भी न हो, तब यह घटना केवल तस्करी का मामला नहीं रह जाती, बल्कि वन सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर कमजोरी और निगरानी तंत्र की विफलता की कहानी भी बयां करती है