कवर्धा , कबीरधाम जिले में वन विभाग के अंतर्गत संचालित चक्रीय निधि योजना का गंभीर दुरुपयोग सामने आया है। जरूरतमंदों को स्वरोजगार देने के उद्देश्य से बनाई गई इस योजना के तहत लाखों रुपये के ऋण रसूखदारों और विभागीय संबंधों वालों को बांटे गए। वर्षों बाद भी न तो ये ऋण लौटाए गए, न ही ठोस वसूली की कार्यवाही की गई।
कबीरधाम जिले के वनमंडल कवर्धा अंतर्गत चक्रीय निधि के नाम पर किया गया ऋण वितरण अब विभाग के लिए गले की फांस बनता जा रहा है। आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को लाभ पहुंचाने के लिए शुरू की गई इस योजना को सफेदपोशों और रसूखदारों ने हथिया लिया, और नतीजा यह है कि करोड़ों की राशि अब भी बकाया है।
मामला 01:
लालसिंह मरकाम को वर्ष 2015 में ₹10 लाख का ऋण वाहन क्रय हेतु दिया गया था, जिसे ब्याज सहित ₹12 लाख बनाकर अप्रैल 2020 तक लौटाना था। लेकिन 2024 तक उन्होंने केवल ₹3 लाख ही लौटाए हैं, ₹10.42 लाख आज भी बकाया है।
मामला 02:
विनेश कुमार धरवैया ने भी ₹10 लाख का ऋण लिया और मात्र ₹1.5 लाख लौटाया। अब ₹11.89 लाख की बकाया राशि पर वसूली नोटिस जारी किए जा चुके हैं, लेकिन कोई असर नहीं।
मामला 03
विवेक तिवारी, जिन्हें उनकी पत्नी विमला तिवारी ने निजी ज़मीन की जमानत पर ऋण दिलवाया, ने केवल ₹15 हजार लौटाए जबकि ₹6.56 लाख अब भी बकाया हैं।
मामला 04:
नसीम अख्तर, जिन्हें ₹9.5 लाख का ऋण मिला था, ने 2024 तक एक भी किश्त नहीं चुकाई। अब ब्याज समेत कुल बकाया ₹12.19 लाख हो चुका है।
विभाग की भूमिका पर सवाल:
जितने भी प्रकरण सामने आए हैं, उनमें एक समान पैटर्न देखने को मिल रहा है—ऋण लेने वाले प्रभावशाली या विभागीय संपर्क वाले लोग हैं, जिन्होंने नियमों की अनदेखी कर ऋण हड़पा और अब वापसी में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।
वन विभाग सिर्फ नोटिस भेजने तक ही अपनी भूमिका निभा रहा है, जबकि कानून के अनुसार ऋण वसूली के लिए वाहन जब्ती, संपत्ति कुर्की और जमानतदारों की संपत्ति अधिग्रहण जैसी सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
निष्कर्ष:
चक्रीय निधि योजना का यह उदाहरण छत्तीसगढ़ में सरकारी योजनाओं के दुरुपयोग की कहानी बयां करता है। ऐसे में ज़रूरत है कि उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो, ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंचे—ना कि रसूखदारों की जेब में जाए ।