मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की “सुशासन तिहार” पहल के तहत कबीरधाम जिले के सुदूर वनांचल चिल्फी और पोलमी गांवों में सोमवार को समाधान शिविर आयोजित किए गए। इन शिविरों में जिला प्रशासन ने ग्रामीणों की समस्याएं सुनने और उनके निराकरण का दावा किया, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर पेश कर रही है।
कलेक्टर गोपाल वर्मा की अगुवाई में चिल्फी क्लस्टर के दस पंचायतों से कुल 1408 आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से 1397 आवेदनों के समाधान की जानकारी दी गई। हालांकि ग्रामीणों की शिकायत है कि इनमें से अधिकांश समस्याओं का समाधान केवल कागज़ों पर ही किया गया है। पेयजल की मांग जैसे ज़रूरी मुद्दों पर “जल जीवन मिशन जल्द चालू होगा” जैसे आश्वासनों के जरिये आवेदन निपटाए गए, जबकि क्षेत्र में अब भी पीने के पानी का संकट बरकरार है।
ग्रामीणों का कहना है कि कई मामलों में उन्हें यह बताया गया कि उनका आवेदन “प्रक्रिया में है” या “बजट आने के बाद स्वीकृति दी जाएगी”। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या प्रशासन वास्तव में समस्या सुलझा रहा है या सिर्फ आंकड़ों में समाधान दिखा रहा है?
शिविर के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य, पेंशन, राशन, मजदूरी भुगतान और वनाधिकार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़े आवेदन भी सामने आए, लेकिन उनमें भी कई मामलों में ‘निराकरण’ का अर्थ सिर्फ प्रक्रिया शुरू करना या विभागीय निर्देश देना भर रहा।
कलेक्टर गोपाल वर्मा ने दावा किया कि सुशासन तिहार का उद्देश्य केवल शिकायतें सुलझाना नहीं, बल्कि शासन की योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है। लेकिन शिविर में ग्रामीणों को जो अनुभव मिला, वह इस दावे पर सवाल खड़े करता है।
शिविर में महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं की सहभागिता उल्लेखनीय रही, परंतु मांग और समाधान के बीच की खाई अब भी स्पष्ट दिख रही है। समाधान शिविर की आगामी तारीखें जारी की जा चुकी हैं, लेकिन यदि समस्याओं का निराकरण इसी तरह दस्तावेजों में होता रहा, तो यह अभियान महज एक प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह जाएगा।