कवर्धा , देश में जब पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर मुद्दों पर वैश्विक चर्चा हो रही है, ऐसे में छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के तरेगांव वन परिक्षेत्र से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे न केवल स्थानीय प्रशासन की विफलता उजागर करती हैं, बल्कि यह प्रश्न भी खड़ा करती हैं — क्या हमारे जंगल सुरक्षित हैं?
जल संरक्षण या बजट की खपत
तरेगांव वन परिक्षेत्र के आमापानी नाला क्षेत्र में पिछले वर्ष लाखों रुपये की लागत से अर्दन डेम बनाए गए थे। उद्देश्य स्पष्ट था — जल संग्रहण, जलस्तर में वृद्धि और वन्य जीवों के लिए स्थायी जल स्रोत। लेकिन आज वहां बूंद भर पानी नहीं दिखता। ग्रामीण बताते हैं कि इन डेमों में न तो पानी है और न ही वन्यजीवों के उपयोग लायक स्थिति। शौच के लिए भी लोग अन्यत्र जाने को मजबूर हैं।
गेबियन निर्माण: ज़रूरत या धांधली
इन डेमों के ठीक पास ‘गेबियन’ (पत्थरों से बने बाँध जैसे संरचना) का निर्माण किया गया है, जो न तो किसी वैज्ञानिक तर्क पर खरा उतरता है और न ही व्यवहारिक रूप से उपयोगी है। लाखों रुपये खर्च करके ऐसी संरचनाएं बनाई गई हैं, जिनका कोई प्रत्यक्ष उपयोग नहीं है। निर्माण में जंगल की चट्टानों और पत्थरों का बेहिसाब दोहन किया गया, जिससे वन क्षेत्र की प्राकृतिक बनावट भी खतरे में पड़ गई है।
नक्सली डर बना वरदान …..
आमापानी गांव पूर्व में नक्सल प्रभावित क्षेत्र था। इसी वजह से अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी उस क्षेत्र का निरीक्षण करने से बचते रहे। इसी भय का लाभ उठाकर वन विभाग ने अपने स्तर पर निर्णय लिए और सरकारी धन का मनमाना उपयोग किया। निरीक्षण की कमी के कारण फर्जी निर्माण कार्यों और धन के दुरुपयोग पर किसी का ध्यान नहीं गया।
वन सुरक्षा में भारी लापरवाही
वन्यजीव संकट में: डेम और जल स्रोत विफल होने के कारण वन्य जीवों के समक्ष पीने के पानी का संकट है।
अवैध कटाई जोरों पर: निरीक्षण और गश्त के अभाव में जंगल में लकड़ी तस्करी और अवैध कटाई की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
वनकर्मियों की गैरहाज़िरी: अधिकतर वन कर्मचारी अपने निर्धारित मुख्यालयों में निवास नहीं करते, जिससे निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था ध्वस्त है।
वन अधिनियमों की अनदेखी: निर्माण कार्यों में पर्यावरणीय दिशा-निर्देशों की अनदेखी हुई है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के निर्माण कार्यों का स्थान चयन, तकनीकी मूल्यांकन और सतत निगरानी आवश्यक होती है। यदि ऐसा नहीं होता, तो यह पर्यावरणीय और आर्थिक अपराध बन जाता है।
उच्चस्तरीय जांच की आवश्यकता
तरेगांव वन परिक्षेत्र में किए गए समस्त निर्माण कार्यों की स्वतंत्र एजेंसी से जांच होनी चाहिए। यदि अनियमितताएं पाई जाती हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही इस पूरे मामले को राज्य और केंद्र सरकार के संज्ञान में लाया जाना चाहिए ताकि पर्यावरण संरक्षण को मज़बूत किया जा सके।
यदि इस जंगल की भी आवाज़ नहीं सुनी गई, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए हम क्या छोड़ेंगे? केवल पत्थर और गेबियन?