महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) की धारा 3 के अनुसार, हर ग्रामीण परिवार को साल में 100 दिन की मजदूरी का कानूनी अधिकार है। इसका मुख्य उद्देश्य जल संरक्षण, कृषि विकास और ग्रामीण बुनियादी ढांचे को मजबूती देना है। लेकिन कबीरधाम जिले के बोडला ब्लॉक के ग्राम पंचायत लबदा के आश्रित ग्राम जोकपानी में योजना का स्वरूप पूरी तरह विकृत हो चुका है।
डबरी निर्माण में वित्तीय अनियमितता
मई 2024 में पलाई नाला किनारे पहाड़ पर बनाए गए तीन डबरियों पर 1.5 लाख रुपये से अधिक प्रति डबरी का खर्च दिखाया गया, जबकि स्थल निरीक्षण से सामने आया कि लगभग 50 हजार रुपये का ही वास्तविक कार्य हुआ है। मनरेगा के दिशा-निर्देश (अनुच्छेद 10 एवं 15) के अनुसार, कार्यस्थल पर सूचना पट्ट, मस्टररोल और माप पुस्तिका सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए – लेकिन यहां इनमें से कोई भी उपलब्ध नहीं था।
मस्टररोल में फर्जीवाड़ा
मस्टररोल (कार्य उपस्थिति पंजी) में आदिवासी किसानों के नामों का उपयोग महज औपचारिकता के लिए किया गया। हकीकत में मजदूरी के भुगतान ऐसे लोगों को किया गया जो या तो कार्यस्थल पर उपस्थित नहीं थे या अधिकारी-कर्मचारियों के रिश्तेदार थे। यह मनरेगा की धारा 25 के तहत स्पष्ट रूप से दंडनीय अपराध है।
आदिवासी अंचलों में योजनागत शोषण
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में कुछ वर्षों से आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कुछ खास लोगों द्वारा इस योजना का दुरुपयोग करते आ रहे हैं। सरकारी राशि का निजी हित में उपयोग कर वे न केवल योजना की आत्मा को मार रहे हैं बल्कि ग्रामीणों के कानूनी अधिकार भी छीन रहे हैं।
जवाबदेही और प्रशासनिक भूमिका
मनरेगा नियमों के अनुसार (अनुच्छेद 30 एवं 31), जिला कार्यक्रम समन्वयक और ग्राम पंचायत सचिव की जवाबदेही तय है। अब यह देखना होगा कि क्या कबीरधाम जिला प्रशासन इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर जांच कराएगा या यह मामला भी अन्य मामलों की तरह “फाइल बंद” होकर रह जाएगा।
जांच की आवश्यकता
यदि सिंचाई डबरी निर्माण कार्यों की तकनीकी और वित्तीय जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जाए। मनरेगा जैसी योजना की विश्वसनीयता बचाने के लिए समय रहते कठोर कार्रवाई जरूरी है।




