विश्व पर्यावरण दिवस एवं “एक पेड़ माँ के नाम” कार्यक्रम के तहत भोरमदेव परिक्षेत्र अंतर्गत जमुनापानी उपपरिक्षेत्र के कक्ष क्रमांक 104 में चारागाह विकास पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधि, चिल्फी एवं भोरमदेव अभ्यारण्य के वनकर्मी शामिल हुए।
कार्यशाला में वन्यजीवों के लिए खाद्य चारागाह तैयार करने की तकनीक पर विशेष रूप से चर्चा की गई। प्रशिक्षकों ने बताया कि सितंबर से दिसंबर के बीच वन अमला घास बीजों का संग्रह करता है, जिन्हें मानसून पूर्व जून-जुलाई में गोबर, रेत और मिट्टी के मिश्रण के साथ जंगल के रिक्त क्षेत्रों में फैलाया जाता है। वर्षा ऋतु में इन बीजों का अंकुरण होकर घास के रूप में विकसित होना, वन्यजीवों के लिए भोजन का प्राकृतिक स्रोत तैयार करता है।
कार्यशाला में यह भी स्पष्ट किया गया कि जंगलों में चारागाह की उपलब्धता से मानव-वन्यजीव संघर्ष में कमी आती है। इससे न सिर्फ वन्य प्राणियों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है बल्कि उनके जीवनयापन के लिए आवश्यक संसाधन भी उपलब्ध होते हैं। ग्रामीणों ने भी अपने पालतू पशुओं को जंगल में चराने से परहेज करने का आश्वासन दिया है।
लाभ:
वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक भोजन की उपलब्धता बढ़ेगी।
मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Animal Conflict) में कमी आएगी।