मानव संसाधन की रीढ़ बन चुके कर्मियों की अनदेखी, योजनाओं पर भी पड़ रहा असर
कवर्धा
छत्तीसगढ़ में कार्यरत 12 हजार से अधिक मनरेगा कर्मचारियों को पिछले चार माह से वेतन नहीं मिला है। मार्च से जून तक की तनख्वाह लंबित है, जिससे कर्मचारियों में भारी नाराजगी है और उनका आर्थिक संकट गहराता जा रहा है।
मनरेगा कर्मियों की भूमिका केवल ग्रामीणों को रोजगार देने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण), स्वच्छ भारत मिशन, पीएम जनमन और अन्य पंचायत स्तरीय योजनाओं के सफल संचालन में भी उनकी अहम भागीदारी है।
हालांकि स्वयं इन कर्मचारियों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। कई कर्मी दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में कार्य कर रहे हैं, जिससे आवागमन का खर्च खुद ही वहन करना पड़ रहा है। लगातार वेतन न मिलने से रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया है।
एक मनरेगा कर्मचारी ने बताया, “बच्चों की स्कूल फीस भरने तक में दिक्कत हो रही है। स्कूल खुल चुके हैं, लेकिन पैसे नहीं हैं। ड्यूटी के दौरान भी मन में वेतन की चिंता रहती है, जिससे कार्य पर भी असर पड़ रहा है।”
कर्मचारियों ने बताया कि उन्होंने कई बार इस समस्या से उच्चाधिकारियों को अवगत कराया, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला। किसी भी स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
अब कर्मचारियों की मांग है कि सरकार शीघ्र वेतन भुगतान की व्यवस्था करे, ताकि वे अपने परिवार का भरण-पोषण सुचारू रूप से कर सकें और ग्रामीण योजनाओं का क्रियान्वयन भी निर्बाध हो सके।
मनरेगा योजना ग्रामीण भारत में रोजगार सृजन की रीढ़ मानी जाती है। लेकिन जब इसे संचालित करने वाले कर्मचारियों को ही समय पर वेतन न मिले, तो न सिर्फ उनका जीवन प्रभावित होता है, बल्कि योजनाओं की प्रभावशीलता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।