सरकार की महत्वाकांक्षी समेकित बाल विकास योजना (आईसीडीएस), जो कुपोषण और मातृ-शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए चलाई जा रही है, वह कबीरधाम जिले में कागजों में सजी-संवरी, लेकिन हकीकत में बदहाल नजर आ रही है। जिले के नौ परियोजनाओं में हजारों गर्भवती एवं धात्री महिलाएं और लाखों बच्चे लाभार्थी के रूप में पंजीकृत हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई इसके उलट है।
माताएं गायब, वितरण कागजों पर दर्ज
जिले में कुल 6660 गर्भवती महिलाएं और 5359 धात्री महिलाएं लाभार्थी के रूप में सूचीबद्ध हैं, लेकिन ज्यादातर आंगनबाड़ी केंद्रों में एक भी महिला नियमित रूप से नहीं आती। पोषण आहार के नाम पर रेडी-टू-ईट 150 ग्राम (615 कैलोरी) प्रतिदिन प्रदाय किया जाना बताया गया है, लेकिन वितरण की कोई ठोस निगरानी व्यवस्था नहीं है।
बच्चों की उपस्थिति में बड़ा घालमेल
दस्तावेजों के अनुसार जिले में 40376 बच्चे (0-3 वर्ष) और 38358 बच्चे (3-6 वर्ष) पंजीकृत हैं। लेकिन वास्तविकता में केंद्रों में केवल 20 से 25 फीसदी बच्चे ही उपस्थित पाए गए। इसके विपरीत, ऑनलाइन डाटा और पोर्टल में 80 फीसदी उपस्थिति दर्शाई जा रही है, जिससे संदेह होता है कि यह बड़ा आंकड़ा घोटाला और वित्तीय गड़बड़ी हो सकता है।
योजना की व्यवस्था और वितरण का सच
रेडी टू ईट वितरण तालिका से खुलासा
श्रेणी प्रदाय सामग्री प्रतिदिन कैलोरी
सामान्य कुपोषित बच्चे (6 माह-3 वर्ष) 125 ग्राम 512.73
> वितरण व्यवस्था में यह भी देखा गया कि कई केंद्रों में हफ्ते में एक-दो दिन ही सामग्री दी जाती है, जबकि कागजों पर प्रतिदिन वितरण दर्ज किया जा रहा है।
सबसे अधिक आंकड़ों वाला परियोजना – स.लोहरा
परियोजना स.लोहरा में सबसे अधिक 7159 बच्चे (0-3 वर्ष), 5496 बच्चे (3-6 वर्ष) और 1235 गर्भवती महिलाएं दर्ज हैं। लेकिन जमीनी निरीक्षण में 50% से अधिक हितग्राही अनुपस्थित मिले।
परियोजनाओं में भी फर्जीवाड़े के संकेत
परियोजना 0-3 वर्ष 3-6 वर्ष गर्भवती धात्री कुल
कवर्धा 6234 4752 1020 849 12855
कुंडा 4495 4818 696 601 10610
पंडरिया 5185 4850 911 714 11660
बोड़ला 4911 4505 925 719 11060
कुकदूर 3333 3995 454 318 8100
> हर परियोजना में ऑनलाइन उपस्थिति 80% से अधिक दर्शाई गई, जबकि जमीनी हकीकत 20-25% से अधिक नहीं।
जांच और कार्यवाही की आवश्यकता
यह स्पष्ट है कि योजना के नाम पर मोटा बजट खर्च हो रहा है, लेकिन लाभार्थी उपेक्षित हैं। गर्भवती और धात्री महिलाएं पोषण आहार से वंचित हैं, और बच्चे बिना समुचित आहार के केंद्रों से दूर हैं। ऐसे में योजना को जनहित में पारदर्शी जांच के दायरे में लाना जरूरी है।