कबीरधाम जिले में पत्रकारिता और अखबार वितरण व्यवस्था गंभीर सवालों के घेरे में है। जहां एक ओर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने समाचार संप्रेषण का प्रमुख जरिया बनते हुए ग्रामीण से लेकर शहरी क्षेत्रों तक अपनी पकड़ बना ली है, वहीं दूसरी ओर जिले में गिने-चुने दैनिक समाचार पत्र ही वास्तविक रूप से वितरित हो पा रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर समाचार पत्रों का वितरण व्यवस्था लगभग ठप है। अधिकांश दैनिक पत्र जिले में पहुँचने के बजाय केवल डिजिटल पीडीएफ फॉर्मेट के सहारे ही संचालित हो रहे हैं। इसके बावजूद इन्हीं अखबारों में नाम परिवर्तन, शपथ पत्र, इस्तिहार और अन्य कानूनी विज्ञापन नियमित रूप से प्रकाशित किए जा रहे हैं।
खास बात यह है कि पेशी तारीख पर संबंधित पक्ष या अधिवक्ता द्वारा विभाग को अखबार की प्रिंटेड प्रति सौंप दी जाती है, जो संदेह की स्थिति को और गहरा करती है। बिना वितरण के ऐसे अखबारों की प्रतियां आखिर कैसे और कहाँ से उपलब्ध हो रही हैं? यह एक बड़ा प्रश्न है।
जनसंपर्क विभाग तक नहीं पहुंचती अखबार की प्रति
स्थानीय जनसंपर्क विभाग में भी कई अखबारों की प्रतियां अब तक नहीं पहुंचतीं, बावजूद इसके विज्ञापन जारी किए जा रहे हैं। यह विभागीय भूमिका को संदेह के घेरे में लाता है और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
प्रशासनिक चुप्पी और निगरानी तंत्र की निष्क्रियता
पूरा मामला इस ओर इशारा करता है कि जिले में अखबार वितरण की निगरानी व्यवस्था निष्क्रिय हो चुकी है। वितरण की अनिवार्य रिपोर्ट, रसीद या प्रमाण की कोई ठोस व्यवस्था न होने के चलते पीडीएफ के माध्यम से अखबार चलाने का यह फॉर्मूला वर्षों से फल-फूल रहा है।
सूचना और जनता तक समाचार पहुंचाने का जिम्मा उठाने वाले अखबारों की मौजूदा हालत चिंताजनक है। यदि इस स्थिति पर शीघ्र संज्ञान नहीं लिया गया, तो यह न केवल पत्रकारिता की साख को कमजोर करेगा बल्कि कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में भी फर्जीवाड़े की आशंका को बल देगा।