कवर्धा। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध भोरमदेव अभ्यारण, जो अपने समृद्ध जैव-विविधता और औषधीय गुणों से परिपूर्ण वनस्पतियों के लिए जाना जाता है, इन दिनों अवैध कटाई और अतिक्रमण के गंभीर संकट से जूझ रहा है। नंदनी टोला से लेकर कुमान क्षेत्र तक जंगल में जहां कभी घने सराई (राजकीय वृक्ष) लहलहाते थे, आज वहाँ केवल ठूंठ ही ठूंठ नजर आते हैं। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, बीते वर्षों में यहाँ हजारों की संख्या में सराई वृक्षों को गाडलिन (गला देकर सुखाना) की कुटिल प्रक्रिया से नष्ट कर खेती की जमीन तैयार कर दी गई। कुछ जगहों पर खेती किया जा रहा है और लगातार कटाई जारी भी है । उक्त स्थल पर हजारों की संख्या में ठूठ ही ठूठ दिखाई देता है।

दो वर्ष पूर्व नंदनी टोला–कुमान इलाके में इस अवैध कटाई प्रकरण में 09 लोगों पर कार्रवाई भी की गई थी, जो फिलहाल न्यायालय में लंबित है। वहीं हाल ही में शीतलपानी के समीप दादूटोला–लरिया जंगल में खुलेआम झोपड़ी बनाकर खेती किए जाने की शिकायतें सामने आईं। इस पर नामजद दो व्यक्तियों पर इस सत्र में कार्रवाई भी हुई, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि संरक्षित क्षेत्र के बीच वर्षों से हो रही ऐसी गतिविधियों पर वन विभाग की नज़र क्यों नहीं पड़ती?

स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि भोरमदेव अभ्यारण के चिल्फी परिक्षेत्र में लंबे समय से एक ही स्थान पर जमे वन अमले ने जंगल और पेड़-पौधों की रक्षा से ज्यादा अपने संबंध निभाने में रुचि दिखाई है। यही वजह है कि जहां हजारों राजकीय सराई के पेड़ गाडलिन कर नष्ट कर दिए गए, वहीं खेत बनाकर खेती करने वालों पर विभाग की ओर से सख्त कार्रवाई नहीं हो पा रही।

गौरतलब है कि भोरमदेव अभ्यारण केवल पेड़-पौधों का खजाना ही नहीं, बल्कि यहां दुर्लभ वन्य जीवों का भी निवास है। बावजूद इसके, निरंतर हो रही अवैध कटाई और अतिक्रमण ने इसकी जैव-विविधता को गंभीर खतरे में डाल दिया है।
जंगल की यह हकीकत आज आमजन तक साफ दिखाई देती है, लेकिन जिम्मेदार विभाग की निगाहें या तो इस पर जाती नहीं हैं, या फिर जानबूझकर अनदेखी की जाती है। यही कारण है कि अब सवाल उठने लगे हैं कि आखिर जिम्मेदारों की जिम्मेदारी तय क्यों नहीं हो पा रही है।







