वनवासी बच्चों की शिक्षा और संस्कार का मंदिर कहलाने वाला दीनदयाल छात्रावास, कोदवागोडान (विकासखंड पंडरिया) इन दिनों गंभीर आरोपों की जद में है। दीनदयाल वनवासी सेवा संस्थान द्वारा संचालित यह छात्रावास अर्धशासकीय संस्था है, जिसे शासन से आर्थिक और संरचनात्मक सहयोग मिलता है।
लेकिन सच्चाई यह है कि यहां वनवासी बच्चों पर अनुशासन और रैंकिंग के नाम पर मारपीट की जा रही है। छोटे और जूनियर छात्रों को प्रताड़ित किया जा रहा है। शिक्षा और संस्कार की बजाय भय और हिंसा का माहौल बन गया है।
मोहन भागवत का प्रवास स्थल अब कटघरे में
यह वही संस्था है जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत जी ने अपने कबीरधाम प्रवास के दौरान रात्रि विश्राम किया था। उस समय संस्था को संघ की आदर्श विचारधारा पर चलने वाला मॉडल छात्रावास बताया गया था।
आज स्थिति यह है कि जिस संस्था को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ा गया था, वही संस्था अब विचारधारा से भटककर बच्चों पर अत्याचार का गढ़ बन चुकी है।
क्या यह संघ की मूल अवधारणा— “वनवासी बच्चों को शिक्षा और संस्कार” —के साथ सीधा विश्वासघात नहीं है।
अर्धशासकीय संस्था, लेकिन निगरानी लापता
चूंकि दीनदयाल छात्रावास अर्धशासकीय है, इसे शासन से :
अनुदान व आर्थिक सहायता,
भवन व रख-रखाव के लिए फंड,
भोजन व शिक्षा सामग्री,
छात्रवृत्ति और सांस्कृतिक सहयोग
जैसी सुविधाएँ नियमित मिलती हैं।
फिर भी यदि बच्चों को भोजन, शिक्षा और सुरक्षा की जगह मारपीट और अपमान मिल रहा है, तो यह न सिर्फ संस्था की नाकामी है बल्कि शासन-प्रशासन की खुली लापरवाही भी है।
“विचारधारा” की आड़ में खिलवाड़
संस्था की स्थापना संघ की विचारधारा से हुई थी। लेकिन अंदर की तस्वीर अब बिल्कुल अलग है। बच्चों को संस्कार देने की बजाय, उन्हें हिंसा का स्वाद चखाया जा रहा है।
संघ प्रमुख का प्रवास हो चुका हो और वहां आज अमानवीयता का बोलबाला हो—यह न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश के लिए चिंता का विषय है।
बड़े सवाल
1. क्या शासन-प्रशासन इस अर्धशासकीय संस्था की नियमित जांच करता है या सिर्फ फाइलों पर हस्ताक्षर होते हैं।
2. जब मोहन भागवत जैसे राष्ट्रीय व्यक्तित्व का प्रवास यहां हो चुका है, तो फिर संस्था पर निगरानी और कठोर क्यों नहीं रही।
3. वनवासी बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा की गारंटी कौन देगा—संघ, संस्था या शासन ।
कबीरधाम का दीनदयाल छात्रावास आज राष्ट्रीय बहस का मुद्दा है। यह मामला सिर्फ बच्चों पर अत्याचार का नहीं, बल्कि अर्धशासकीय संस्थाओं की जवाबदेही और संघ की विचारधारा से विचलन का भी है।
यदि सरकार, संघ और संस्था ने अब भी आंखें मूंदी रहीं, तो यह न सिर्फ बच्चों का भविष्य तबाह करेगा बल्कि उस भरोसे को भी तोड़ेगा जिसे मोहन भागवत जैसे शीर्ष नेतृत्व ने कभी यहां ठहरकर मजबूत किया था।