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गोण्डीयन समाज ने राष्ट्रपति को सौंपा ज्ञापन – गोण्डवाना गढ़ किलाओं के संरक्षण और संवैधानिक अधिकारों की मांग

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कवर्धा
गोण्डीयन समाज ने अपनी प्राचीन विरासत, गढ़-किलों और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु को संबोधित करते हुए एक सामूहिक ज्ञापन सौंपा है। ज्ञापन जिला कबीरधाम (छत्तीसगढ़) के जिलाधिकारी के माध्यम से भेजा गया।

ज्ञापन में कहा गया है कि स्वतंत्रता के बाद भाषाई आधार पर राज्यों का गठन तो हुआ, परंतु गोण्डी भाषियों को उनका ‘गोण्डवाना राज्य’ नहीं मिला। इसके चलते गोण्डवाना साम्राज्य के ऐतिहासिक गढ़, किले और परंपराएं उपेक्षा का शिकार हो रही हैं।

प्रमुख मांगें
1. गढ़-किलों का संरक्षण व प्रबंधन गोण्डीयन समुदाय को सौंपा जाए।
2. गोण्डी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए।
3. गोण्डवाना राज्य का ऐतिहासिक राजचिह्न “गज-सोडूम” (हाथी पर सवार शेर) को संवैधानिक मान्यता दी जाए।
4. कवर्धा का प्राचीन नाम ‘कवधुरागढ़’ पुनः स्थापित किया जाए।

5. कंकालीन पचराही सहित पेनठाना, मड़वा महल, भोरमदेव, छेरकी महक जैसे स्थलों को गोण्डीयन समुदाय की संरक्षण में दिया जाए।
6. आदिवासी संज्ञा को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया जाए।
स्थानीय विवाद और शिकायतें भी उठाईं
प्रतापगढ़ (पंडरिया) स्थित प्राचीन गढ़-किलों पर बाहरी हस्तक्षेप और जबरन मूर्ति स्थापना की शिकायत की गई।
14 अगस्त 2025 को गढ़ के गेट का ताला तोड़कर वैदिक पद्धति से पूजा-पाठ कराने के मामले में जिम्मेदार पुलिस कर्मचारी पर कार्रवाई की मांग की गई।
कबीरधाम जिले के कई गोण्डीयन परिवारों की भूमि कब्जा विवाद, फर्जी पट्टों, जाति प्रमाणपत्रों और मारपीट की घटनाओं पर भी संज्ञान लेने की अपील की गई।
बोड़ला क्षेत्र के दलदली गांव में बॉक्साइट खदान से प्रभावित परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास की मांग की गई।

समाज की पीड़ा
गोण्डीयन समाज का कहना है कि अन्य समुदायों की धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षण और ट्रस्ट प्रबंधन दिया गया, लेकिन गोण्डीयनों को अब तक उनका अधिकार नहीं मिला। इसके चलते उनकी प्राचीन पहचान, संस्कृति और इतिहास धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर है।

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