वन्यजीव संरक्षण कानूनों की खुलेआम धज्जियाँ, गश्त व्यवस्था और मुख्यालय में जमे वनकर्मियों पर उठे गंभीर प्रश्न
कवर्धा। जिले की जैव–विविधता और गौरव का प्रतीक भोरमदेव अभ्यारण्य एक बार फिर शिकारियों की निष्ठुर हरकत का शिकार हुआ है। परिक्षेत्र चिल्फी के पीड़ाघाट (सल्हेवारा) के पास शिकारियों द्वारा अवैध करंट बिछाकर एक बायसन का शिकार कर लिया गया। यह घटना न केवल वन विभाग की सतर्कता पर प्रश्नचिह्न लगाती है बल्कि यह भी दर्शाती है कि अभ्यारण्य की सीमाओं पर गश्त और निगरानी व्यवस्था कितनी खोखली हो चुकी है।
मुख्यालय में जमे वनकर्मियों की ‘दूरस्थ निगरानी’—जमीन पर न के बराबर गश्त
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि अधिकांश वनकर्मी मुख्यालय में ही निवास करते हैं और मैदान स्तर पर नियमित गश्त नगण्य है। लंबे समय से गश्त की कमी का लाभ उठाकर शिकारी निर्भय होकर बिजली करंट जैसी प्रतिबंधित विधियों का उपयोग कर रहे हैं, जो वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 9 व 51 के तहत दंडनीय अपराध है और इसमें कठोर कारावास का प्रावधान है।
करंट से शिकार—कानून का स्पष्ट उल्लंघन
करंट बिछाकर जंगली पशुओं का शिकार करना न केवल गंभीर अपराध है बल्कि यह क्षेत्र की पारिस्थितिकीय शृंखला के साथ कृतघ्नता जैसा कृत्य है। बायसन जैसी संरक्षित प्रजाति पर इस प्रकार का हमला अनुसूची-I के अंतर्गत आता है, जिसमें अपराधी को 3 से 7 वर्ष तक का कारावास और भारी आर्थिक दंड अनिवार्य है।
वन विभाग की लापरवाही उजागर
अभ्यारण्य क्षेत्र में नियमित गश्त का अभाव
कई चौकियों में जनशक्ति की कमी
मुख्यालय आधारित ड्यूटी की आड़ में मैदानी कार्य उपेक्षित
स्थानीय स्तर पर सूचना तंत्र कमजोर
इन सभी पहलुओं ने शिकारियों का मनोबल बढ़ाया है और संरक्षण व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
संरक्षित प्रजाति पर हमला—अभ्यारण्य की प्रतिष्ठा पर आघात
भोरमदेव का बायसन केवल एक जंगली जीव नहीं, बल्कि जिले की पहचान और पारिस्थितिकी संतुलन का महत्वपूर्ण स्तंभ है। इस घटना ने उस गंभीर खतरे को उजागर कर दिया है, जिससे अभ्यारण्य की भविष्य की जैवविविधता प्रभावित हो सकती है।
सूत्रों से मिली जानकारी अनुसार विभाग ने तीन लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ जारी है।