राज्य सरकार द्वारा छेरछेरा पूर्णिमा एवं माता शाकंभरी जयंती के अवसर पर घोषित सामान्य अवकाश के बावजूद कबीरधाम जिले में शिक्षा विभाग की अनिवार्य बैठक आयोजित किए जाने से प्रशासनिक फैसलों पर सवाल खड़े हो गए हैं। एक ओर सरकार का उद्देश्य लोगों को अपनी आराध्य देवी की सामूहिक पूजा और सामाजिक आयोजनों में सहभागिता का अवसर देना था, वहीं दूसरी ओर अवकाश के दिन बुलाई गई बैठक ने सामाजिक और धार्मिक भावनाओं को आहत करने का काम किया है।
स्वामी आत्मानंद शासकीय विद्यालय के ऑडिटोरियम में आयोजित बैठक में कलेक्टर श्री गोपाल वर्मा ने जिले के समस्त शासकीय विद्यालयों के प्राचार्यों, संकुल समन्वयकों एवं बीईओ के साथ बोर्ड परीक्षा की तैयारियों की गहन समीक्षा की। कलेक्टर ने स्पष्ट कहा कि बोर्ड परीक्षा में अब मात्र दो माह का समय शेष है, ऐसे में सभी विद्यालय लक्ष्य निर्धारित कर योजनाबद्ध और परिणामोन्मुखी कार्य करें।
उन्होंने कमजोर विद्यार्थियों की पहचान कर उनके लिए विशेष रणनीति, नियमित विकली टेस्ट, कठिन पाठ्यक्रम का अलग से रिवीजन, अतिरिक्त कक्षाओं के आयोजन और लेखन शैली व प्रस्तुति सुधार पर विशेष जोर दिया। साथ ही प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को जेईई एवं नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए प्रेरित करने के निर्देश भी दिए।
कलेक्टर श्री वर्मा ने आपार आईडी को शीघ्र अपडेट कराने, जन्मतिथि सहित सभी त्रुटियों को तत्काल सुधारने और वीएसके ऐप में शत-प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। बैठक में जिला शिक्षा अधिकारी श्री एफ.आर. वर्मा, सहायक संचालक श्री एम.के. गुप्ता, श्री विनोद श्रीवास्तव सहित जिले के लगभग 150 शासकीय विद्यालयों के प्राचार्य उपस्थित रहे।
हालांकि बैठक की तारीख और समय को लेकर सामाजिक असंतोष भी सामने आया है।
3 जनवरी को माता शाकंभरी जयंती के अवसर पर मरार पटेल समाज द्वारा सहसपुर लोहारा विकासखंड मुख्यालय सहित विभिन्न सामाजिक ग्रामों में वृहद धार्मिक एवं सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। माता शाकंभरी समाज की आराध्य देवी हैं और समाज के अनेक लोग शिक्षक, संकुल समन्वयक और प्राचार्य जैसे महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दे रहे हैं। प्रशासनिक बैठक के कारण वे सामाजिक आयोजनों में शामिल नहीं हो सके, जिससे समाज में नाराजगी देखी जा रही है।
समाजजनों का कहना है कि जब सरकार स्वयं धार्मिक और सामाजिक उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए अवकाश घोषित करती है, तब अवकाश के दिन अनिवार्य प्रशासनिक बैठक आयोजित करना शासन की मंशा के विपरीत प्रतीत होता है। यह मामला अब केवल एक बैठक तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता बनाम सामाजिक आस्था के टकराव का प्रतीक बन गया है।
स्पष्ट है कि शिक्षा की गुणवत्ता सुधार अत्यंत आवश्यक है, लेकिन इसके साथ-साथ सामाजिक परंपराओं और धार्मिक भावनाओं के सम्मान का संतुलन भी उतना ही जरूरी है—ताकि प्रशासनिक निर्णय जनभावनाओं के अनुरूप और सर्वस्वीकृत हो सकें।