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धौराभाठा में चूना पत्थर खदान के खिलाफ ग्रामीणों का उबाल, कलेक्टर से लगाई रोक की गुहार, नहीं माने तो आंदोलन का ऐलान

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 छत्तीसगढ़ के धान के कटोरे कहे जाने वाले बलौदाबाजार जिले में एक बार फिर खनन बनाम खेती का टकराव सामने आया है। भाटापारा तहसील के ग्राम धौराभाठा में प्रस्तावित चूना पत्थर खदान के विरोध में ग्रामीण खुलकर सड़कों पर उतरने की चेतावनी दे रहे हैं। ग्रामीणों ने कलेक्टर जनसुनवाई में पहुंचकर खदान खोलने की अनुमति को निरस्त करने की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासनिक पत्र के माध्यम से उन्हें जानकारी मिली है कि ग्राम धौराभाठा के खसरा नंबर 12/1 की लगभग 3.7 एकड़ भूमि में चूना पत्थर उत्खनन की अनुमति दी गई है, साथ ही करीब 20 एकड़ क्षेत्र में भी खनन की स्वीकृति की बात सामने आ रही है। इससे गांव में भय और आक्रोश का माहौल है।
ग्रामीणों के अनुसार धौराभाठा पहले से ही चूना पत्थर खदानों, क्रशर और मिट्टी खदानों से जूझ रहा है। लगातार उड़ती धूल, तेज धमाके, ध्वनि प्रदूषण और जल-प्रदूषण ने जनजीवन को प्रभावित कर दिया है। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं के स्वास्थ्य पर इसका गंभीर असर पड़ रहा है।
ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि धौराभाठा एक कृषि प्रधान गांव है, जहां धान की खेती ही आजीविका का मुख्य आधार है। यदि नई खदान शुरू होती है तो खेतों पर धूल की मोटी परत जम जाएगी, जल स्रोत दूषित होंगे और खेती पूरी तरह चौपट हो जाएगी। इससे सैकड़ों किसान परिवारों की रोजी-रोटी पर संकट खड़ा हो जाएगा।
ग्रामीण कृष्ण कुमार वर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है और हमारा गांव पूरी तरह खेती पर निर्भर है। खदान खुली तो खेत, पानी और हवा तीनों बर्बाद हो जाएंगे। गांव को खदान नहीं, खेती चाहिए।
वहीं ग्रामीण दिलेश्वर ध्रुव ने चेतावनी देते हुए कहा कि पहले ही आसपास की खदानों और क्रशरों से परेशान हैं, अब नई खदान ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। अगर प्रशासन ने नहीं सुना तो ग्रामीण एकजुट होकर बड़ा आंदोलन करेंगे।
ग्रामीणों का आरोप है कि बिना ग्रामसभा, बिना जनसुनवाई और बिना किसानों की सहमति के खनन की अनुमति दी गई, जो नियमों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है। ग्रामीणों ने मांग की है कि किसी भी नए खनन कार्य से पहले ग्रामसभा की सहमति, पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन और जनसुनवाई अनिवार्य की जाए।
ग्रामीणों ने साफ शब्दों में कहा है कि यदि प्रशासन ने उनकी मांगों को नजरअंदाज किया, तो वे सड़क से लेकर कलेक्ट्रेट तक आंदोलन करने को मजबूर होंगे। बलौदाबाजार में यह मुद्दा अब केवल एक गांव का नहीं, बल्कि खेती, पर्यावरण और ग्रामीण अस्तित्व से जुड़ा बड़ा सवाल बनता जा रहा है।

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