468 ग्राम पंचायतों और चार जनपद पंचायतों—पंडरिया, बोड़ला, सहसपुर लोहारा और कवर्धा—वाले कबीरधाम जिला पंचायत की हालत आज “बिना कप्तान की टीम” जैसी हो गई है।
हैरानी की बात यह है कि यह जिला स्वयं उप मुख्यमंत्री एवं पंचायत मंत्री का निर्वाचन क्षेत्र है, फिर भी जिला पंचायत को अब तक पूर्णकालिक मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) नसीब नहीं हो सका।
तत्कालीन जिला पंचायत सीईओ अजय कुमार त्रिपाठी के उप मुख्यमंत्री अरुण साव के यहां संलग हो जाने के बाद से जिला पंचायत सीईओ का पद रिक्त पड़ा है। फिलहाल अपर कलेक्टर विनय पियाम को अतिरिक्त प्रभार देकर व्यवस्था चलाई जा रही है। सवाल यह है कि अतिरिक्त प्रभार के सहारे इतने बड़े जिले की पंचायत व्यवस्था आखिर कब तक चलाई जाएगी।
सीईओ जैसे महत्वपूर्ण पद के बिना योजनाओं की निगरानी, वित्तीय अनुशासन और विकास कार्यों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है। प्रभार की व्यवस्था में न तो प्रशासनिक कसावट आ पाती है और न ही जवाबदेही तय हो पाती है, जिसका सीधा असर पंचायत स्तर के कार्यों पर पड़ता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कबीरधाम पंचायत मंत्री का अपना जिला है, तब भी जिला पंचायत को पूर्णकालिक सीईओ क्यों नहीं मिल रहा? क्या 468 ग्राम पंचायतों का विकास केवल अस्थायी प्रभार और भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है? जनता अब जवाब चाहती है—कब मिलेगा कबीरधाम जिला पंचायत को उसका स्थायी “कप्तान”।