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गुपचुप के स्वाद में छिपा जहर: कवर्धा में सफाई और सुरक्षा को ठेंगा दिखा रहे ठेले

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कवर्धा। शहर की गलियों, चौक-चौराहों और बाज़ारों में गुपचुप, चाट, टिकिया और अन्य फास्ट फूड की दुकानों की भरमार हो गई है। ये ठेले आज हर मोहल्ले में मिल जाते हैं और युवाओं से लेकर बच्चों तक की पसंद बन चुके हैं। परन्तु स्वाद की इस दुनिया के पीछे छिपे कड़वे सच से आम जनता अनजान है। सफाई, सुरक्षा और नियमों का घोर उल्लंघन इन ठेले गाड़ियों पर खुलेआम हो रहा है।
चाट-गुपचुप की बाढ़: लेकिन सुविधाएं ना के बराबर
कवर्धा में गली-गली फास्ट फूड के ठेले बिना किसी प्रशासनिक रोक-टोक के संचालित हो रहे हैं। न तो इनके पास कोई वैध लाइसेंस है, न ही स्वास्थ्य विभाग की स्वीकृति। खासकर शाम के समय चौक-चौराहों पर ठेले इतनी तादाद में लगते हैं कि ट्रैफिक और भीड़-भाड़ की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है।
घरेलू गैस का व्यावसायिक उपयोग: सुरक्षा को खतरा
इन ठेलों में बड़ी संख्या में घरेलू एलपीजी गैस सिलेंडर का उपयोग किया जा रहा है। जो सिलेंडर घरेलू रसोई के लिए निर्धारित हैं, उन्हीं से खुले स्थानों पर तवे गरम किए जा रहे हैं। यह न सिर्फ अवैध है, बल्कि जानलेवा भी। घरेलू सिलेंडर पर सुरक्षा मानकों की उतनी पुख्ता व्यवस्था नहीं होती, जिससे कभी भी हादसा हो सकता है। कई घटनाएं अन्य शहरों में सामने आ चुकी हैं, जहां ठेले पर सिलेंडर फटने से गंभीर दुर्घटनाएं हुई हैं।
सफाई का हाल बेहाल: संक्रमण का खतरा
ज्यादातर ठेले वाले प्लेट धोने के लिए एक ही बाल्टी में गंदा पानी भरकर उसका बार-बार उपयोग करते हैं। चम्मच, प्लेटें उसी में डुबाकर पुनः ग्राहकों को परोसी जाती हैं। टिश्यू पेपर, साफ पानी, हाथ धोने की सुविधा जैसी बुनियादी चीज़ें तक मौजूद नहीं होतीं। विक्रेता न तो दस्ताने पहनते हैं, न ही बाल ढंकने का ध्यान रखते हैं। गंदे हाथों से खाना परोसा जाता है। मक्खियाँ खुले खाद्य पदार्थों पर मंडराती रहती हैं। यह सब मिलकर गंभीर संक्रमण और बीमारियों को न्यौता देता है।
बाल श्रम का खुला उपयोग: क़ानून की अनदेखी
शहर के अनेक फास्ट फूड ठेलों पर 10-12 साल के बच्चे काम करते नजर आते हैं। ये बच्चे प्लेट धोने, टेबल साफ करने से लेकर ग्राहकों को पानी देने तक का काम करते हैं। बाल श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम के अनुसार, किसी भी 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे से किसी भी व्यावसायिक गतिविधि में कार्य कराना अवैध है। बावजूद इसके न तो प्रशासन की नजर इन पर पड़ती है, न ही बाल संरक्षण इकाइयों की।
खाद्य सुरक्षा अधिनियम की धज्जियां
भारत में FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण) द्वारा तय किए गए कई नियम इन ठेले वालों पर लागू होते हैं, जैसे:
खाद्य विक्रेता का पंजीकरण अनिवार्य।
विक्रेता द्वारा स्वच्छता के मानक जैसे दस्ताने, हेयरनेट, एप्रन का उपयोग।
साफ पेयजल और खाद्य पदार्थों को ढककर रखना।
खाना बनाने के उपकरण और बर्तन की साफ-सफाई सुनिश्चित करना।
बच्चों से कार्य न कराना।
परन्तु इन नियमों का पालन ना के बराबर होता है।
शहर की छवि और नागरिकों का स्वास्थ्य दोनों खतरे में
. जन स्वास्थ्य पर प्रभाव: दूषित खाना पेट की बीमारियों, टायफाइड, हेपेटाइटिस, फूड पॉइजनिंग और अन्य संक्रमणों का कारण बन सकता है।
. शहर की छवि धूमिल: ऐसे गंदगी और अव्यवस्था भरे ठेले बाहरी पर्यटकों और आम नागरिकों के लिए खराब अनुभव पैदा करते हैं।
. बाल अधिकारों का हनन: बच्चों को शिक्षा से दूर करके जबरन श्रम में लगाना उनके मानसिक और शारीरिक विकास पर प्रतिकूल असर डालता है।
समाधान और प्रशासनिक जिम्मेदारी
नियमित जांच: नगर निगम और खाद्य विभाग को संयुक्त रूप से नियमित निरीक्षण करना चाहिए।
FSSAI रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता: सभी फूड विक्रेताओं को रजिस्ट्रेशन के लिए बाध्य किया जाए।
प्रशिक्षण शिविर: ठेले वालों को सफाई, खाद्य सुरक्षा और प्राथमिक उपचार पर प्रशिक्षण दिया जाए।
बाल श्रम पर सख्ती: जहां भी नाबालिग कार्य करते मिले, वहां कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
स्वाद के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी
चाट-गुपचुप का स्वाद सबको लुभाता है, पर जब यह स्वाद संक्रमण, बीमारी और हादसों का कारण बन जाए तो यह चिंता का विषय है। प्रशासन, नागरिक और विक्रेता—सभी की जिम्मेदारी है कि इन ठेलों को सुरक्षित, स्वच्छ और नियमों के अनुसार संचालित किया जाए। क्योंकि सेहत से बड़ा कोई स्वाद नहीं।

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