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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के विवादित बयान से आदिवासी समाज में उबाल: सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की खुली अवहेलना

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कवर्धा
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री द्वारा आदिवासियों को “सबसे बड़ा हिंदू” करार दिए जाने पर प्रदेश भर में आक्रोश फैल गया है। आदिवासी समाज ने इस बयान को अपनी धार्मिक पहचान और अस्तित्व के खिलाफ बताया है। इसी क्रम में कबीरधाम जिले में आदिवासी प्रतिनिधियों ने कलेक्टर कार्यालय पहुँचकर एक विस्तृत ज्ञापन सौंपते हुए मुख्यमंत्री के बयान पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई।
ज्ञापन में स्पष्ट किया गया है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न फैसलों में आदिवासियों को हिन्दू धर्म से अलग एक स्वतंत्र धार्मिक समूह के रूप में मान्यता दी है। आदिवासी समाज मूलतः प्रकृति पूजक है, जो ‘सरना’ धर्म की परंपराओं का पालन करता आया है। उनके सामाजिक जीवन, विवाह संस्कार, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक रीतियों का स्वरूप मुख्यधारा के धर्मों से बिल्कुल भिन्न है।

आदिवासी समाज का आरोप है कि मुख्यमंत्री द्वारा आदिवासियों को “हिंदू” बताकर न केवल उनकी विशिष्ट पहचान को मिटाने का प्रयास किया गया है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का भी सीधा उल्लंघन किया गया है। यह बयान संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के भी विपरीत है।
ज्ञापन में चिंता जताई गई कि आज़ादी के बाद से आदिवासी समाज की सांस्कृतिक स्वतंत्रता पर निरंतर हमले हो रहे हैं। अब राजनीतिक लाभ और वैचारिक एजेंडों के चलते आदिवासियों को हिंदू धर्म में जबरन समाहित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, जो भारतीय लोकतंत्र और बहुलतावादी संस्कृति के लिए घातक है।
ज्ञापनकर्ताओं ने यह भी सवाल उठाया कि मुख्यमंत्री स्वयं एक आदिवासी पृष्ठभूमि से आते हैं और संवैधानिक आरक्षण का लाभ उठाकर उच्च पद तक पहुँचे हैं। ऐसे में उनसे अपेक्षित था कि वे आदिवासी समाज की अस्मिता और स्वाभिमान की रक्षा करें, न कि उसे विकृत करने वाला बयान दें।
आदिवासी समाज ने मुख्यमंत्री से अपने बयान पर अविलंब सार्वजनिक माफी मांगने तथा आदिवासी धर्म की स्वतंत्र पहचान को विधिवत मान्यता देने की मांग की है। साथ ही भारत सरकार से भी आग्रह किया गया है कि आदिवासियों के लिए “सरना कोड” को मान्यता दी जाए ताकि उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अस्तित्व को स्थायी संरक्षण मिल सके।
राष्ट्रीय अध्यक्ष – बस्तारावेन धुमकेती , प्रदेश उपाध्यक्ष – नोहर सिंह धुर्वे , प्रदेश महासचिव – दिनेश पोर्ते ,जिला अध्यक्ष – मिल्खा पोर्ते , ब्लाक अध्यक्ष – उत्तम सिंह नेताम , राष्ट्रीय संरक्षक – डां, जे लिंगों ज्ञापन देने पहुंचे थे।
छत्तीसगढ़ के इस घटनाक्रम ने न केवल राज्य स्तर पर, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी अस्मिता और अधिकारों को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। आने वाले समय में यह मुद्दा देशव्यापी आंदोलन का रूप ले सकता है।

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