कबीरधाम जिले के शहरी और ग्रामीण इलाकों में होटलों, ढाबों, वर्कशॉप और अन्य छोटे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में बाल श्रमिकों का खुलेआम उपयोग किया जा रहा है। श्रम कानूनों और बाल श्रम निषेध अधिनियमों के बावजूद प्रशासनिक निगरानी की कमी के चलते यह गंभीर सामाजिक समस्या और भी विकराल रूप लेती जा रही है।
बालश्रम अधिनियम 1986 के तहत 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से श्रम कराना पूर्णतः प्रतिबंधित है, और 18 वर्ष तक के किशोरों को खतरनाक कार्यों से दूर रखना अनिवार्य है। इसके बावजूद जिले में नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
चाइल्डलाइन की भूमिका सीमित, शासकीयकरण के बाद आई शिथिलता
कबीरधाम जिले में पहले जहाँ चाइल्डलाइन जैसी एनजीओ सक्रिय रूप से बच्चों को रेस्क्यू करने और पुनर्वास में सहायक थी, वहीं उसके शासकीयकरण के बाद अब बच्चों की त्वरित सहायता और निगरानी का तंत्र लगभग निष्क्रिय हो चला है। न तो नियमित छापामारी हो रही है और न ही बच्चों के पुनर्वास की कोई स्पष्ट योजना नजर आती है।
अपराध में नाबालिगों की बढ़ती संलिप्तता, पुलिस कार्रवाई में खुलासे
हाल ही में जिले में सामने आए लूट, चोरी, हत्या, और नशाखोरी जैसे कई आपराधिक मामलों में नाबालिगों की संलिप्तता उजागर हुई है। पुलिसिया कार्यवाहियों के दौरान यह बात सामने आई है कि इन अपराधों में लिप्त अधिकांश किशोर या तो बचपन से श्रमिक के रूप में काम कर चुके हैं या शिक्षा और देखरेख के अभाव में अपराध की ओर प्रवृत्त हो गए हैं।
नशे की गिरफ्त में मासूम बचपन
शहर व गांवों में सुलभ रूप से उपलब्ध नशीले पदार्थ—गांजा, स्प्रिट, सॉल्यूशन व तंबाकू उत्पाद—अब स्कूली व अनपढ़ बच्चों तक आसानी से पहुंच रहे हैं। यह समाज के लिए बेहद चिंताजनक संकेत हैं। किशोरों के गिरोह बनना और सोशल मीडिया के ज़रिए अपराध की योजनाएं बनाना पुलिस व अभिभावकों दोनों के लिए नई चुनौती बन चुका है।
रोकथाम एवं बाल श्रम मुक्ति के लिए जन संगठनों के साथ समन्वित प्रयास की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पुलिस कार्रवाई या श्रम निरीक्षण से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR), शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, NGO और समाज के सहयोग से एक संयुक्त रणनीति अपनानी होगी।
जन जागरूकता के प्रति जिला प्रशासन की घोर उदासीनता
ज्ञात हो कि जिले में कई ऐसे संगठन हैं जो जन जागरूकता के लिए कार्य कर रहे हैं। लेकिन जिला प्रशासन की घोर उदासीनता के चलते बेहतर समन्वय की कमी के कारण बाल श्रम, बाल भिक्षावृत्ति जैसे गंभीर समस्याओं के लिए जन जागरूकता आगे नहीं बढ़ पा रही है। जिला प्रशासन को ऐसे जन जागरूकता करने वाले स्वयंसेवी संगठनों को आदर एवं प्रोत्साहित करते हुए सहयोग करना चाहिए, ताकि बाल श्रम मुक्ति के लिए बेहतर कार्य किया जा सके।
प्रशासनिक निष्क्रियता पर उठ रहे सवाल
जिला प्रशासन द्वारा बाल श्रम रोकने के लिए न तो नियमित सर्वे किए जा रहे हैं और न ही होटल, ढाबा, निर्माण स्थलों पर निरीक्षण की कार्यवाही हो रही है। इससे यह आशंका गहराई है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी और सामाजिक उदासीनता के चलते एक संपूर्ण पीढ़ी शिक्षा और अधिकारों से वंचित रह सकती है।
विशेष अनुरोध
यदि आप स्वयं या आपके आस-पास कोई बाल श्रमिक या संकटग्रस्त बच्चा देखें, तो तत्काल नजदीकी पुलिस थाना, बाल कल्याण समिति, या चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 पर संपर्क करें।