कवर्धा । एक ओर सरकार किसानों की आय बढ़ाने और समय पर भुगतान का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर पंडरिया स्थित लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल सहकारी शक्कर कारखाना के हजारों गन्ना किसान अपनी ही मेहनत की कमाई के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। मिली जानकारी अनुसार पेराई सत्र 2025-26 में किसानों का 26 करोड़ 32 लाख 11 हजार 270 रुपये से अधिक का भुगतान अब तक लंबित है। यह राशि उन किसानों की है जिन्होंने महीनों पहले अपना गन्ना कारखाने में बेच दिया, लेकिन आज तक उन्हें पूरी रकम नहीं मिल सकी है।
मिली जानकारी अनुसार 19 नवंबर 2025 से 7 फरवरी 2026 तक कुल 8050 किसानों ने 12,17,216.40 क्विंटल गन्ने की आपूर्ति की थी। इसके एवज में किसानों को कुल 40 करोड़ 5 लाख 25 हजार 52 रुपये का भुगतान किया जाना था। लेकिन कारखाना प्रबंधन द्वारा केवल 13 करोड़ 73 लाख 13 हजार 782 रुपये का भुगतान किया गया, जबकि 26 करोड़ 32 लाख 11 हजार 270 रुपये अभी भी बकाया हैं।
यह आंकड़ा केवल कागजों में दर्ज एक राशि नहीं है, बल्कि हजारों किसान परिवारों की उम्मीदों, जरूरतों और संघर्षों की कहानी है। खेतों में दिन-रात मेहनत करने वाले किसानों ने बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और परिवहन पर लाखों रुपये खर्च किए। कई किसानों ने साहूकारों से कर्ज लिया, बैंक से ऋण लिया और फसल तैयार होने पर यह उम्मीद की कि गन्ना बेचने के बाद उन्हें समय पर भुगतान मिलेगा। लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी भुगतान अटका हुआ है।
ग्रामीण क्षेत्रों में इस समय खरीफ फसल की तैयारी का दौर शुरू हो चुका है। किसानों को खाद, बीज और कृषि यंत्रों की आवश्यकता है। जिन किसानों का गन्ना भुगतान अटका हुआ है, वे नई फसल की तैयारी के लिए आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। कई किसान कर्ज के ब्याज का बोझ उठा रहे हैं तो कई परिवारों को बच्चों की पढ़ाई, इलाज और घरेलू जरूरतों के लिए भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कारखाना किसानों से गन्ना समय पर खरीद सकता है, तो भुगतान समय पर क्यों नहीं कर सकता। आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां हैं कि 26 करोड़ रुपये से अधिक की राशि महीनों तक किसानों को नहीं मिल पाई? क्या किसानों की मेहनत और उनके अधिकार केवल भाषणों और घोषणाओं तक सीमित रह गए हैं।
दस्तावेज में यह भी उल्लेख है कि 17 मार्च 2026 को 481 किसानों को 47,974.61 क्विंटल गन्ने के एवज में 1 करोड़ 57 लाख 86 हजार 50 रुपये का भुगतान जारी किया गया था। इसके बावजूद बड़ी संख्या में किसान आज भी अपने भुगतान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि भुगतान प्रक्रिया बेहद धीमी रही और अधिकांश किसानों को राहत नहीं मिल सकी।
ग्रामीण अंचलों में किसानों के बीच इस मुद्दे को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है। किसानों का कहना है कि जब वे बैंक या सहकारी समितियों का ऋण समय पर नहीं चुका पाते तो उन पर ब्याज और वसूली की कार्रवाई शुरू हो जाती है, लेकिन जब सरकारी व्यवस्था या सहकारी संस्थान किसानों का भुगतान रोकते हैं तो जवाबदेही तय नहीं होती।
कृषि प्रधान क्षेत्र पंडरिया में गन्ना किसानों की अर्थव्यवस्था काफी हद तक शक्कर कारखाने के भुगतान पर निर्भर करती है। भुगतान में देरी का सीधा असर स्थानीय बाजार, छोटे व्यापारियों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। किसानों के पास पैसा नहीं पहुंचने से गांवों में आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।
अब सवाल यह है कि किसानों के बकाया 26 करोड़ 32 लाख रुपये का भुगतान आखिर कब होगा। क्या जिम्मेदार अधिकारी और कारखाना प्रबंधन किसानों की पीड़ा सुनेंगे या फिर हजारों किसान परिवार अपनी ही मेहनत की कमाई के लिए यूं ही इंतजार करते रहेंगे। खेतों में पसीना बहाने वाले अन्नदाता के लिए यह केवल भुगतान का मामला नहीं, बल्कि उसके सम्मान, आजीविका और भविष्य का प्रश्न बन चुका है।





