कबीरधाम की फिजा इन दिनों कुछ बदली-बदली जरूर लग रही है। दागदार छवि वाले कुछ अधिकारियों की विदाई और अपेक्षाकृत साफ-सुथरी छवि वाले अधिकारियों की पदस्थापना के बाद लोगों में उम्मीद जगी है कि शायद अब बिगड़ी कानून-व्यवस्था पटरी पर लौटे। लेकिन कुर्सी के कान कहते हैं कि केवल चेहरे बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती, उसके लिए नीयत और कार्रवाई दोनों बदलनी पड़ती है।
जिला कोई साधारण नहीं है। यहां दो सांसद, प्रदेश के उप मुख्यमंत्री (गृह, जेल, पंचायत एवं ग्रामीण विकास सहित कई महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री), विधानसभा अध्यक्ष, विधायक और दो कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त नेता मौजूद हैं। राजनीतिक ताकत की कोई कमी नहीं, लेकिन सवाल यह है कि इतनी ताकत के बावजूद अवैध शराब, गांजा, जुआ, हत्या और अन्य अपराधों की चर्चाएं आखिर क्यों थमने का नाम नहीं ले रहीं?
हालात तब और चिंताजनक लगते हैं, जब सत्ता पक्ष की गुटबाजी खुलेआम चर्चा का विषय बनी रहती है। विपक्ष भी जनता के मुद्दों पर एकजुट होने के बजाय अपने ही अंतर्विरोधों में उलझा दिखाई देता है। नतीजा यह कि कानून-व्यवस्था दो पाटों के बीच पिसती नजर आती है और जनता सिर्फ तमाशबीन बनकर रह जाती है।
कुर्सी के कान यह भी सुन रहे हैं कि कुछ विभागों के जिम्मेदार लोग अपनी सरकारी जिम्मेदारियों से ज्यादा निजी कार्यों में व्यस्त बताए जाते हैं। ब्लॉक कार्यालय से अधिक उनकी मौजूदगी रजिस्ट्री कार्यालय और तहसील परिसर के आसपास चर्चा का विषय रहती है। लोग तंज कसते हैं कि सरकारी फाइलों की चाल चाहे धीमी हो, लेकिन जमीन के सौदों की खबरें उनसे पहले किसी को नहीं मिलतीं। यदि यह केवल जनचर्चा है तो उसका खंडन होना चाहिए, और यदि इसमें तथ्य हैं तो निष्पक्ष जांच भी होनी चाहिए।
अब जिले की जनता नए अधिकारियों से केवल तबादलों की नहीं, परिणामों की उम्मीद कर रही है। अपराधियों में कानून का डर दिखना चाहिए, न कि आम नागरिकों में। कार्रवाई यदि निष्पक्ष और निरंतर हुई, तभी सुशासन की तस्वीर बदलेगी।
कुर्सी के कान आखिर में बस इतना ही कहते हैं— कबीरधाम को नई कुर्सियों से ज्यादा नई कार्यसंस्कृति की जरूरत है। वरना कुर्सियां बदलती रहेंगी, अपराध बढ़ते रहेंगे और जनता हर बार सिर्फ उम्मीदों का नया कैलेंडर बदलती रहेगी।