कहते हैं कि महापुरुषों की प्रतिमाएं उनके विचारों का प्रतीक होती हैं। लेकिन लगता है कुछ लोगों ने प्रतिमा को विचार नहीं, व्यापार का माध्यम बना लिया है। भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री और छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के अटल बिहारी वाजपेई के नाम पर लग रही प्रतिमाओं को लेकर अब श्रद्धा से ज्यादा खरीद-बिक्री की चर्चा सुनाई दे रही है।
सुना है कि गांवों में कभी अटल चौक बने थे, अब शहरों में लाखों रुपये की लागत से अटल प्रतिमाएं स्थापित हो रही हैं। लेकिन गलियारों में कानाफूसी है कि प्रतिमाओं का रास्ता हर बार एक ही दुकान तक पहुंच जाता है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यह अटल प्रेम है या किसी खास सप्लायर पर अटूट विश्वास।
दिलचस्प बात यह है कि जब गुणवत्ता और खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठे तो निशाने पर सप्लायर नहीं, एक उप अभियंता आ गया। यानी मलाई किसी और ने खाई और मिर्च किसी और के हिस्से आ गई। यह प्रशासनिक जवाबदेही है या बलि का बकरा खोजने की पुरानी परंपरा, इसका जवाब शायद जांच ही दे सके।





