छत्तीसगढ़ शासन ने एक बार फिर फरमान जारी किया है कि अधिकारी और कर्मचारियों का डेस्क असाइनमेंट हर तीन साल में बदला जाए, ताकि पारदर्शिता बढ़े, जवाबदेही आए और सुशासन मजबूत हो। कागज पर यह आदेश इतना सुंदर दिखता है कि पढ़ने वाला भी सोच ले—अब तो व्यवस्था बदलकर रहेगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आदेश उन दफ्तरों तक भी पहुंचेगा, जहां वर्षों से कुछ बाबू और अधिकारी अपनी कुर्सी को पुश्तैनी संपत्ति समझकर बैठे हैं।

स्वास्थ्य, शिक्षा, वन, कलेक्ट्रेट,राजस्व, पंचायत और कई विभागों में ऐसे चेहरे मिल जाएंगे, जिनकी कुर्सी बदलने की कल्पना करना भी किसी तबादला नीति से बड़ा चमत्कार लगता है। फाइलें बदलती हैं, सरकारें बदलती हैं, सचिव बदल जाते हैं, लेकिन कुछ डेस्क ऐसी हैं जिनका रिश्ता इतना अटूट है कि मानो नियुक्ति पत्र में ही स्थायी आरक्षण लिख दिया गया हो।
शासन का तर्क है कि एक ही डेस्क पर लंबे समय तक बैठे रहने से पारदर्शिता प्रभावित होती है। यह बात बिल्कुल सही है। लेकिन यही बात वर्षों से सब जानते हैं, फिर भी व्यवस्था वहीं की वहीं है। हर बार नया आदेश आता है, कुछ दिन चर्चा होती है, फिर वही पुरानी कुर्सी, वही पुराना बाबू और वही पुराना हिसाब-किताब।




