BP NEWS CG
औद्योगिक क्षेत्रकवर्धाछत्तीसगढ़बड़ी खबरसमाचारसिटी न्यूज़

लाखों की लागत के गौठान वीरान-जर्जर, सरकार बदली तो भूले छत्तीसगढ़ी रिवाज

Flex 10x20 new_1
previous arrow
next arrow

कवर्धा

 छत्तीसगढ़ में सरकार बदलने के साथ योजनाओं की प्राथमिकताएं भी बदलती नजर आ रही हैं। इसका असर कबीरधाम जिले में सैकड़ों की संख्या में बनाए गए गौठानों पर साफ दिखाई दे रहा है। कभी गांव की अर्थव्यवस्था, पशुपालन, महिला समूहों के रोजगार और छत्तीसगढ़ी संस्कृति के संरक्षण का केंद्र बताए गए गौठान आज वीरान और जर्जर हालत में नजर आ रहे हैं। लाखों रुपये की लागत से तैयार किए गए इन परिसरों में अब न पहले जैसी गतिविधियां दिखाई देती हैं और न ही ग्रामीणों के लिए रोजगार तथा अतिरिक्त आय के अवसर नजर आते हैं।

पूर्ववर्ती सरकार की योजना के तहत गौठानों को गांव की आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश की गई थी। यहां गोबर खरीदी, जैविक खाद निर्माण और अन्य गतिविधियों के माध्यम से महिला स्व-सहायता समूहों की दीदियों को रोजगार उपलब्ध कराने की पहल हुई थी। पशुपालकों के लिए भी गोबर बिक्री अतिरिक्त आमदनी का जरिया बनी थी। मवेशियों से निकलने वाले गोबर को बेचकर पशुपालक अपने परिवार की आय में कुछ अतिरिक्त राशि जोड़ रहे थे।

गौठानों की अवधारणा केवल गोबर खरीदी तक सीमित नहीं थी। इन्हें ग्रामीण जीवन, पशुधन संरक्षण और स्थानीय अर्थव्यवस्था के केंद्र के रूप में विकसित करने का प्रयास किया गया था। लेकिन व्यवस्था में बदलाव के बाद कई स्थानों पर इन गतिविधियों की रफ्तार थम गई। परिणाम यह है कि जिन परिसरों में कभी ग्रामीणों और महिला समूहों की आवाजाही रहती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा दिखाई देता है। कई गौठानों में रखरखाव के अभाव में भवन, शेड और अन्य संरचनाएं धीरे-धीरे जर्जर हो रही हैं।

गौठान से गायब हुई हरेली की रौनक

गौठानों का संबंध केवल सरकारी योजना से नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति और परंपराओं से भी जुड़ गया था। हरेली तिहार के अवसर पर गौठानों में गौधन की पारंपरिक पूजा की जाती थी। ग्रामीण परंपराओं के साथ छत्तीसगढ़ी व्यंजन, पारंपरिक खेलकूद और विभिन्न सांस्कृतिक आयोजन भी होते थे। गांव के लोगों के लिए गौठान केवल एक सरकारी परिसर नहीं, बल्कि त्योहार और सामुदायिक गतिविधियों का स्थान बन गया था।

अब सवाल यह है कि सरकार बदलने के साथ क्या

 योजनाओं के साथ उनसे जुड़ी ग्रामीण परंपराएं भी भुला दी जाएंगी। यदि गौठानों की मौजूदा गतिविधियां बंद हो गई हैं तो इन परिसरों में खर्च की गई लाखों रुपये की राशि का उपयोग और भविष्य क्या होगा, यह सवाल ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

जर्जर ढांचों पर जवाबदेही तय होनी जरूरी

कबीरधाम जिले में बने गौठानों की वर्तमान स्थिति का प्रशासन को सर्वे कराना चाहिए। जिन परिसरों में मामूली मरम्मत से गतिविधियां दोबारा शुरू हो सकती हैं, उन्हें पुनर्जीवित किया जाना चाहिए। महिला स्व-सहायता समूहों, पशुपालकों और ग्रामीण युवाओं को जोड़कर इन परिसरों का उपयोग फिर से रोजगारमूलक गतिविधियों के लिए किया जा सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि लाखों रुपये खर्च कर बनाए गए गौठान यदि उपयोग के अभाव में जर्जर होकर वीरान हो रहे हैं, तो उनकी जिम्मेदारी किसकी है। योजना किसी भी सरकार की हो, सरकारी धन जनता का है और उससे बने परिसरों को यूं ही बदहाल छोड़ देना किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता।

कबीरधाम जैसे कृषि और पशुपालन प्रधान जिले में जरूरत इस बात की है कि गौठानों को राजनीतिक योजनाओं की पहचान के बजाय ग्रामीण विकास के स्थायी संसाधन के रूप में देखा जाए। उन्हें दोबारा पशुपालन, जैविक खाद, महिला समूहों के रोजगार और स्थानीय संस्कृति से जोड़ा जाए, ताकि सरकारी खर्च से खड़े किए गए ये परिसर वीरानी के प्रतीक नहीं, बल्कि गांव की अर्थव्यवस्था और छत्तीसगढ़ी परंपरा के जीवंत केंद्र बन सकें।

IMG-20250710-WA0006
previous arrow
next arrow

Related posts

बढ़ते अपराध पर सख्ती: तलवार लहराकर जान से मारने की धमकी देने वाला आरोपी गिरफ्तार

Bhuvan Patel

सशक्त नेतृत्व का प्रतीक: अभनपुर में मरार पटेल समाज का ऐतिहासिक सम्मेलन एवं भव्य लोकार्पण समारोह

Bhuvan Patel

अब मनरेगा में विज्ञान की ताकत: युक्तधारा पोर्टल से तय होंगे 2026–27 के कार्य, ग्रामीणों की सहमति से बनेगी पारदर्शी विकास योजना”

Bhuvan Patel

Leave a Comment

error: Content is protected !!