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उद्योगों की लापरवाही से पनपा जल संकट, अब प्रशासन और ग्रामीणों की भागीदारी से राहत के प्रयास

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जल संरक्षण की दिशा में “मोर गांव, मोर पानी” अभियान बना संकट प्रबंधन का अस्थायी समाधान
बलौदाबाजार, ग्रामीण इलाकों में बढ़ते जल संकट के लिए एक बड़ी वजह खुद वही औद्योगिक गतिविधियां हैं, जिनका लाभ राज्य की अर्थव्यवस्था को होता रहा है। सिमगा अनुविभाग के उत्खनन प्रभावित क्षेत्रों में जल स्रोतों के सूखने और भूजल स्तर में गिरावट जैसी समस्याएं तब तक गंभीर नहीं मानी गईं, जब तक ग्रामीणों की आवाज़ ज़ोर से नहीं गूंजी।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय द्वारा शुरू किया गया “मोर गांव, मोर पानी” महाभियान भले ही आज संकट से राहत का माध्यम बन रहा है, पर यह भी स्पष्ट करता है कि अगर समय रहते उद्योगों और प्रशासन ने ज़िम्मेदारी निभाई होती तो शायद यह स्थिति आती ही नहीं।
सिमगा क्षेत्र में खनन गतिविधियों के चलते कई पारंपरिक जल स्रोत या तो सूख गए या फिर अप्रयुक्त हो गए। ग्रामीणों की शिकायतों के बाद अनुविभागीय समिति ने हस्तक्षेप किया और जांच के बाद सीमेंट संयंत्रों को जिम्मेदार ठहराते हुए जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
उद्योगों ने CSR (कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) के तहत कुछ प्रयास किए—जैसे खदानों में जमा पानी को गांवों तक पहुंचाना, पाइपलाइन बिछाना, टैंकरों से जल आपूर्ति करना और कुछ स्थानों पर कैनाल निर्माण कराना। अल्ट्राटेक व श्री सीमेंट संयंत्रों ने पहल की, लेकिन यह पहल तब हुई जब ग्रामीणों ने प्रशासन को बार-बार अवगत कराया।
ग्राम मटिया, शिकारी-केसली, चंडी, परसवानी जैसे इलाकों में आज भी जल आपूर्ति पूरी तरह से स्थायी नहीं हो सकी है। कई गांव अभी भी टैंकरों पर निर्भर हैं और जल जीवन मिशन के तहत बनी टंकियों को अब जाकर नए जल स्रोतों से जोड़ा गया है।
यह त्रिस्तरीय समन्वय—प्रशासन, उद्योग और ग्रामीण—इस बात का प्रमाण है कि जब तक समस्या सिर पर नहीं आ जाती, तब तक समाधान की पहल नहीं होती।
“मोर गांव, मोर पानी” अभियान संकट के समाधान की ओर एक कदम जरूर है, लेकिन यह भी याद दिलाता है कि यदि उद्योगों को पहले ही जवाबदेह बनाया जाता और प्रशासन सतर्क रहता, तो ग्रामीणों को इतनी बड़ी कीमत नहीं चुकानी पड़ती।

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