पूर्ववर्ती सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना के तहत प्रदेश के प्रत्येक विकासखंड में हरियाली को बढ़ावा देने एवं पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से लाखों रुपये की लागत से कृष्ण कुंज की स्थापना की गई थी। इसका उद्देश्य न केवल प्राकृतिक संतुलन बनाए रखना था, बल्कि आम नागरिकों को शांति और आध्यात्मिकता से जुड़ने का एक स्थान उपलब्ध कराना भी था।
सकरी नदी के किनारे बसा यह कृष्ण कुंज, जिसे बड़ी उम्मीदों और सरकारी निवेश के साथ विकसित किया गया था, आज प्रशासनिक उपेक्षा और लापरवाही के कारण शराबियों, गांजा पीने वालों और असामाजिक तत्वों का अड्डा बन चुका है। वन विभाग के जिम्मे इसकी देखरेख की जिम्मेदारी थी, लेकिन सरकार बदलते ही न तो विभाग ने इस ओर ध्यान दिया, और न ही किसी प्रकार की निगरानी या सुधारात्मक कार्रवाई की गई।
कृष्ण कुंज में रोपे गए अनेक दुर्लभ प्रजातियों के पौधे, जो भविष्य में इस क्षेत्र को हराभरा और पर्यावरण के लिहाज से समृद्ध बना सकते थे, अब देखरेख के अभाव में सूखने की कगार पर हैं। वहीं, आसपास के स्थानीय लोगों का कहना है कि रात होते ही यह स्थल नशे के सौदागरों और नशेड़ियों का गढ़ बन जाता है।
कृष्ण कुंज के समीप स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर, जो धार्मिक आस्था का केंद्र है, वह भी अब असुरक्षित महसूस किया जा रहा है। मंदिर में पूजा-अर्चना करने वाले श्रद्धालु असामाजिक तत्वों की गतिविधियों के चलते भयभीत रहते हैं और अंधेरा होते ही वहाँ आना टालते हैं।
स्थानीय लोगों की मांग है कि प्रशासन इस दिशा में शीघ्र कार्रवाई करे। सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, नियमित निगरानी हो और वन विभाग को जिम्मेदारी का निर्वहन करने के लिए बाध्य किया जाए। अन्यथा यह कृष्ण कुंज, जो कभी हरियाली और आध्यात्मिकता का प्रतीक बनने वाला था, पूर्णतः अराजकता का केंद्र बन जाएगा।