प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) गरीबों के सिर पर पक्की छत का सपना पूरा करने के लिए चलाई गई थी। यह योजना बेघर, कमजोर और वंचित तबके को सम्मानजनक आश्रय देने की गारंटी थी। लेकिन नगर पंचायत पांडातराई (जिला कबीरधाम) में इस योजना को लेकर जो खुलासा हुआ है, वह भ्रष्टाचार और मिलीभगत का खुला सबूत है।
यहाँ आवास योजना की राशि से मकान नहीं, बल्कि व्यवसायिक कांपलेक्स खड़ा कर दिया गया। गरीबों के रहने लायक घर की जगह दुकानों और प्रतिष्ठानों की कतारें खड़ी कर दी गईं। और सबसे हैरानी की बात — अधिकारियों ने इसे देखकर भी आँख मूँद ली और निर्माण का भुगतान खटाखट कर दिया।
योजना की मंशा थी कि गरीबों को घर मिले, लेकिन पांडातराई में नजारा उल्टा है। कई आवास रसूखदारों ने गरीब हितग्राहियों से खरीद लिए। यानी गरीबों के हिस्से का हक़ सीधे अमीरों और दबंगों की झोली में चला गया।
योजना का मूल उद्देश्य और उपयोगिता —
बेघरों को छत देना।
शहरी झुग्गी-झोपड़ियों को खत्म करना।
सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा देना।
लेकिन पांडातराई में यह योजना भ्रष्टाचारियों और ठेकेदारों की कमाई का जरिया बन गई। गरीब परिवार आज भी किराये और झोपड़ी में रहने को मजबूर हैं, जबकि सरकारी पैसे से बने मकानों में रसूखदार मजे से मुनाफा कमा रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सिर्फ़ ग़लती नहीं बल्कि सिस्टमेटिक लूट है। सवाल यह भी है कि आवास और कांपलेक्स में फर्क न देख पाने वाले अधिकारी आज भी कुर्सी पर क्यों बैठे हैं ।
अब यह मामला सिर्फ़ गरीबों के साथ धोखा नहीं बल्कि कानून और शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता पर भी सीधा हमला है। अगर इस पर उच्चस्तरीय जाँच नहीं हुई तो पीएम आवास योजना जैसे जनहितकारी प्रोजेक्ट्स पर से आम जनता का भरोसा उठ जाएगा।