छत्तीसगढ़ की पवित्र धरती पर स्थित तुरतुरिया हिल स्टेशन केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि यह वह ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर है जहाँ इतिहास, पुरातत्व और आस्था एक साथ सांस लेते हैं। ग्राम पंचायत भिभौरी, विकासखंड कसडोल, जिला बलौदाबाजार में स्थित यह स्थल न केवल प्राकृतिक सौंदर्य का केंद्र है बल्कि रामायणकालीन घटनाओं और बौद्धकालीन विरासत का साक्षी भी है।
रामायणकाल से जुड़ी दिव्य गाथाएँ
स्थानीय मान्यताओं और ह्वेनसांग के उल्लेख के अनुसार, यहीं पर लक्ष्मण और खर-दूषण का युद्ध हुआ था, तथा सूर्पनखा की नाक काटी गई थी। कहा जाता है कि भगवान राम, सीता और लक्ष्मण ने इस पहाड़ी की गुफा — जिसे आज बागबिला गुफा कहा जाता है — में कुछ समय बिताया था। अब यहाँ पूजा-अर्चना के लिए मंदिर स्थापित है।
बौद्धकालीन विरासत और पुरातात्विक साक्ष्य
तुरतुरिया में आज भी 8वीं से 11वीं शताब्दी की अनेक मूर्तियाँ, स्तंभ और स्थापत्य अवशेष मिलते हैं। शिवलिंग, विष्णु, सीता, बुद्ध आदि की मूर्तियाँ यहाँ की ऐतिहासिक महत्ता सिद्ध करती हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग की पुस्तकों में इसका उल्लेख मौजूद है। कहा जाता है कि चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपनी भारत यात्रा के दौरान इस स्थल का जिक्र किया था।
मातागढ़ मंदिर — श्रद्धा का शिखर
तुरतुरिया पहाड़ी पर मातागढ़ मंदिर तक पहुँचने के लिए लगभग 1000 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। लोकश्रुति है कि यहाँ एक सिद्ध भक्तिन माता रहती थीं जो शेर पर सवारी करती थीं। निःसंतान दंपत्ति यहाँ संतान की प्राप्ति के लिए “बदना” चढ़ाते हैं। हर वर्ष पौष पूर्णिमा पर तीन दिवसीय छेरछेरा मेला यहाँ श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
महर्षि वाल्मीकि आश्रम और साधना परंपरा
लगभग पाँच दशक पहले तक यह स्थान राम-जानकी-लक्ष्मण मंदिर के नाम से जाना जाता था। बाद में गुरु किशोर दास और रामबालक दास ने इसे महर्षि वाल्मीकि आश्रम के रूप में प्रसिद्ध किया। तभी से यह स्थान संत परंपरा और तांत्रिक साधना का केंद्र बन गया ।स्व. रामरतन तिवारी, जो मध्यप्रदेश के पूर्व कलेक्टर और प्रसिद्ध तांत्रिक थे, यहाँ साधना किया करते थे। उनकी समाधि आज भी यहाँ स्थित है।
रहस्यमय खुदाई और पुरातत्व की गाथा
1980 के दशक में पुरातत्व विभाग ने यहाँ खुदाई शुरू की थी, परंतु अचानक हुई रहस्यमयी घटनाओं और कर्मचारियों की अस्वस्थता के कारण कार्य रोक दिया गया। खुदाई में जो मूर्तियाँ निकलीं, वे आज भी क्षेत्र में स्थापित हैं और पुरातात्विक धरोहर का हिस्सा हैं।
आज का तुरतुरिया — राम वन गमन पथ का गौरवस्थल
आज तुरतुरिया छत्तीसगढ़ शासन के राम वन गमन पथ परियोजना में शामिल है। यहाँ कबीर कुटी आश्रम, काली मंदिर, सीता मंदिर, वैदेही बिहार, और राम-जानकी-लक्ष्मण मंदिर जैसे अनेक धार्मिक स्थल हैं। वन विभाग ने यहाँ यात्री प्रतीक्षालय भी बनाया है। हालाँकि यह वन क्षेत्र में स्थित है, इसलिए शाम 5 बजे के बाद यहाँ रुकने के लिए अनुमति आवश्यक है।
बाल्मीकि जयंती पर श्रद्धांजलि
महर्षि वाल्मीकि जयंती के अवसर पर तुरतुरिया का महत्व और भी बढ़ जाता है। यही वह पवित्र भूमि है जहाँ आदि कवि महर्षि वाल्मीकि की तपस्या की स्मृति आज भी जीवित है। यह स्थल हमें यह संदेश देता है कि छत्तीसगढ़ केवल भौगोलिक रूप से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से भी भारतीय सभ्यता की आत्मा से जुड़ा है।
तुरतुरिया हिल स्टेशन — जहाँ इतिहास बोलता है, आस्था झूमती है, और प्रकृति स्वयं भक्ति का रूप ले लेती है।