क्षेत्र में रेत का अवैध खनन और परिवहन प्रशासन के लिए खुली चुनौती बन चुका है। चिखली रेत घाट इसका जीता-जागता उदाहरण है, जहां हफ्तेभर पहले रेत से लदे हाईवा ने क्रूजर सवारी गाड़ी को टक्कर मार दी थी। इस दर्दनाक हादसे में 3 लोगों की मौत और 9 से अधिक लोग घायल हुए थे। इसके बावजूद अवैध खनन पर कोई ठोस अंकुश नहीं लग पाया है।
मंगलवार को दिनभर चिखली घाट पर चेन माउंटेन मशीनों से खुलेआम रेत की खुदाई और लोडिंग होती रही। जैसे ही शाम करीब 6 बजे जांच टीम के आने की सूचना फैली, वैसे ही खुदाई अचानक बंद कर दी गई। मशीनों को आसपास की झाड़ियों में छुपा दिया गया। टीम के पहुंचने पर घाट पर सन्नाटा पसरा मिला और औपचारिक निरीक्षण कर अधिकारी लौट गए। उनके जाते ही फिर से अवैध खनन शुरू हो गया।
नियम कागजों में, हकीकत में मशीनों का राज
नियमों के मुताबिक रेत की खुदाई मजदूरों से, हाथों से और सुबह 6 से शाम 6 बजे तक की जानी चाहिए। लेकिन चिखली घाट पर दिन-रात चेन माउंटेन मशीनों से खनन जारी है। ग्रामीणों का आरोप है कि कार्रवाई से पहले सूचना लीक होना मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
एक मशीन सील, दूसरी से खनन जारी
रेत माफिया के हौसले इतने बुलंद हैं कि कुछ दिन पहले खनिज विभाग द्वारा एक मशीन सील कर घाट बंद किया गया था। वह मशीन अब भी नदी में सील पड़ी है, लेकिन मंगलवार को दूसरी मशीन से अवैध खनन और लोडिंग होती रही। कार्रवाई की भनक लगते ही घाट फिर बंद कर दिया गया।
टीम ने नहीं खोजीं छुपी मशीनें, कुरूद घाट पर भी अनदेखी
ग्रामीणों का कहना है कि मशीनें हर बार घाट के आसपास ही छुपाई जाती हैं, लेकिन टीम झाड़ियों में खोजबीन तक नहीं करती। यही नहीं, कुरूद रेत घाट तक टीम पहुंची ही नहीं, जहां अवैध खनन लगातार चलता रहा। इससे आसपास के गांवों में भारी आक्रोश है।
अफसरों की भूमिका पर सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार अधिकारी घाट पर पहुंचकर सिर्फ खानापूर्ति करते हैं—न गहराई से जांच, न छुपी मशीनों की तलाश। या तो वे माफिया के दबाव में हैं या फिर सीधी मिलीभगत है। जब तक विभाग के भीतर से सूचना लीक होना बंद नहीं होगा, तब तक अवैध खनन यूं ही फलता-फूलता रहेगा।
जिम्मेदार अफसर फोन से गायब
इस पूरे मामले पर उप संचालक खनिज राजेश मालवे से उनका पक्ष जानने के लिए उनके मोबाइल नंबर 9826178407 पर दो बार संपर्क किया गया, लेकिन फोन रिसीव नहीं हुआ और न ही संदेश का कोई जवाब मिला। इससे पहले उन्होंने केवल इतना कहा था कि “मामला दिखवाते हैं।” 30 दिसंबर को भी टीम गई थी, लेकिन लौटते ही फिर खुदाई शुरू हो गई।
सवाल साफ है—जब मौत के बाद भी कार्रवाई सिर्फ दिखावा है, तो रेत माफिया पर लगाम कौन लगाएगा?