राम राज्य में अब नया अध्याय जुड़ गिस— चूहा राज। विष्णु के सुशासन में, गणेश भगवान के सवारी चूहा मनखें अइसन मौज मनाइन कि धान संग्रहण केंद्र चारभाटा के सात करोड़ के धान ला ‘प्रसाद’ समझ के चट कर गिन। अफसर मन कागज पलटत रहिन, चूहा मन बोरा पलट देइन।
ग्रामीण मन हंसत-हंसत पूछत हें— “जब भगवान के सवारी एतका आगे बढ़ गे हें, त हमर जिम्मेदारी कऊन ”
धान केंद्र के गोदाम म सुरक्षा भगवान भरोसे, त चूहा मन अवसर भरोसे। न सीसीटीवी के डर, न ताला-कुंडी के खौफ— पूरा मूषक महाभोज!
अब गांव के बुद्धिजीवी मन एकदम नवाचार ले आ गे हें। मांग ये हे कि चूहों के (लेडी) मल ला संग्रहित कर जैविक खाद बनाके बेचे जावय। गणित सीधा हे— धान गिस नुकसान — मल गिस मुनाफा!
राजस्व घाटा — खाद गिस कमाई!
ग्रामीण मन कहिथें— “जब चूहा सात करोड़ के धान खा सकत हें, त ओकर लेडी अरब के खाद बना सकत हे।” ग्रामीण मन सुझाव देय जावत हे कि ‘मूषक विकास योजना’ शुरू करे जावय— चूहा पालो, मल संजोवो, घाटा पाटो!
व्यंग्य ये नइ, हकीकत के आईना ये हे। कागज में सुशासन, गोदाम में चूहा शासन।
सवाल अब ये नइ कि धान कऊन खाइस, सवाल ये हे कि जवाबदेही कऊन खाइस
जब तक जवाब नइ मिलही, तब तक चारभाटा म चूहा मन कहिथें— “जय हो!”