सावन की झड़ी जारी है। प्रदेश का एक बड़ा हिस्सा माता नर्मदा और भगवान शिव की शरण में आस्था की डुबकी लगा रहा है, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश के बेरोजगार युवा खुले आसमान के नीचे अपनी नौकरी और हक की लड़ाई लड़ते हुए चार दिन से बारिश, कीड़े-मकोड़ों और जहरीले जीव-जंतुओं के बीच सड़क पर रात-दिन काट रहे हैं।
कुर्सी के कानों को यह दृश्य देखकर समझ नहीं आ रहा कि इसे सुशासन कहें, बेरोजगारों का तप कहें या सरकारी संवेदनशीलता की परीक्षा! युवाओं की मांग भी कोई आसमान से तारे तोड़ने की नहीं है। वे पुलिस भर्ती में रिक्त पदों को भरने, वेटिंग सूची से नियुक्ति देने और दूसरी सूची जारी करने की मांग कर रहे हैं।
पूर्व में सामने आए आंकड़ों के अनुसार 5,967 पदों में करीब 4,000 पदों पर भर्ती हुई और 1,967 पद रिक्त बताए गए। न्यायालय के आदेश और भर्ती नियमों का हवाला देते हुए युवा सरकार से रिक्त पदों की पूर्ति की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर सरकार नियम, अधिनियम और प्रक्रियाओं का हवाला दे रही है। यानी युवाओं के हाथ में नियुक्ति की उम्मीद और सरकार के हाथ में नियमों की किताब—पेच वहीं फंसा है।
विडंबना यह भी है कि कबीरधाम जैसे राजनीतिक रूप से प्रभावशाली जिले में प्रदेश के युवा घर-परिवार छोड़कर इस आंदोलन में बैठे हैं। पुलिस भर्ती में जिले से चयनित युवाओं की भी बड़ी संख्या रही है और अब वही युवा वेटिंग तथा रिक्त पदों की दूसरी सूची की उम्मीद लगाए बैठे हैं। एक तरफ प्रदेश में सुशासन के बड़े-बड़े दावे हैं, दूसरी तरफ नौकरी की आस में युवा बारिश को छत और सड़क को बिस्तर बनाकर बैठे हैं।
कुर्सी के कान आखिर पूछ ही रहे हैं—जब खाली पद सरकारी कागज में दिखाई दे रहे हैं और योग्य युवा सड़क पर, तो आखिर किस नियम की चादर ओढ़कर सरकार सो रही है।