कवर्धा। आदिवासी बाहुल्य बोड़ला विकासखंड के बैरख से स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत सामने आई है। ईद मिलाद-उन-नबी के अवसर पर शासकीय अवकाश घोषित होने के बावजूद बैरख स्थित आयुष्मान आरोग्य मंदिर एवं उप स्वास्थ्य केंद्र के मुख्य द्वार पर ताला लटका मिला। तस्वीर में अस्पताल पूरी तरह बंद दिखाई दे रहा है। ऐसे में छुट्टी के दिन किसी ग्रामीण को अचानक उपचार की जरूरत पड़ने पर मरीज के सामने स्वास्थ्य सुविधा हासिल करने का संकट खड़ा हो जाता है।
बैरख जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं ग्रामीणों के लिए महत्वपूर्ण सहारा हैं। दूरस्थ गांवों से मरीज छोटी-बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार के लिए इन्हीं सरकारी संस्थानों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे क्षेत्र में स्वास्थ्य केंद्र का बंद मिलना ग्रामीणों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
एक तरफ शासन ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने के दावे करता है, वहीं दूसरी ओर सरकारी अवकाश के दिन स्वास्थ्य केंद्र के मुख्य द्वार पर ताला व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़े कर रहा है। खासकर गर्भवती महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और अचानक बीमार पड़ने वाले मरीजों के लिए ऐसी स्थिति परेशानी बढ़ा सकती है।
यदि संबंधित स्वास्थ्य केंद्र में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं के संचालन का प्रावधान है तो अवकाश के दिन ड्यूटी व्यवस्था और तैनात कर्मचारियों की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। नियमित सेवा बंद होने की स्थिति में आपातकालीन मरीजों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जिम्मेदारी भी विभाग की है।
सरकारी छुट्टी का अर्थ स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह ठप करना नहीं होना चाहिए। जरूरतमंद मरीजों को समय पर उपचार उपलब्ध कराना स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है। बैरख के इस मामले में विभागीय अधिकारियों को केंद्र बंद रहने की वास्तविक स्थिति, ड्यूटी रोस्टर और आपातकालीन व्यवस्था की जानकारी स्पष्ट करनी चाहिए।
कागजों में स्वास्थ्य सुविधा, जमीन पर अस्पताल में ताला। बोड़ला के बैरख की तस्वीर आदिवासी क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था और विभागीय निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करती है।