कवर्धा।
जिला कबीरधाम में कुल 9 परियोजनाओं के अंतर्गत 1742 आंगनवाड़ी केंद्र संचालित हैं। शासन के नियमों और सुप्रीम कोर्ट/हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के अनुसार आंगनवाड़ी केंद्र साल में 300 दिन यानी प्रतिमाह 25 दिन खुलना अनिवार्य है। इन दिनों में गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और 6 माह से 6 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क पोषण आहार, टीकाकरण व स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
लेकिन हकीकत यह है कि जिले के अधिकांश आंगनवाड़ी केंद्र नियमित रूप से नहीं खुलते।
परियोजना वार आंगनवाड़ी केंद्रों की संख्या
चिल्फी – 172
बोडला – 231
कुंडा – 164
तरेगांव जंगल – 135
कवर्धा – 212
सहसपुर लोहारा – 259
पंडरिया – 183
दशरंगपुर – 175
कुकदूर – 211
कुल – 1742
शासन और कोर्ट के स्पष्ट निर्देश
भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने सभी राज्यों को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं कि आंगनवाड़ी केंद्र साल में 300 दिन अनिवार्य रूप से संचालित हों।
सुप्रीम कोर्ट ने “राइट टू फूड केस” (PUCL बनाम भारत सरकार) में आदेश दिया था कि आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों और माताओं को नियमित पोषण आहार देना राज्य सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि पोषण आहार सिर्फ कागज़ पर नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर हर हितग्राही तक पहुँचना चाहिए।
जमीनी हकीकत
कई बार स्थानीय अवकाश या त्योहारों के नाम पर केंद्र बंद रहते हैं।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के अलग-अलग संगठन अपनी मांगों को लेकर ज्ञापन सौंपते हैं और हड़ताल पर चली जाती हैं।
हड़ताल के दौरान पोषण आहार का वितरण पूरी तरह बंद हो जाता है और हजारों हितग्राही वंचित रह जाते हैं।
कई ग्रामीण क्षेत्रों में तो महीनों तक केंद्र बंद रहने की शिकायतें सामने आई हैं।

जिम्मेदारी किसकी
1. कार्यकर्ता और सहायिकाएं – यदि वे लगातार हड़ताल करती हैं तो उनकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
2. परियोजना अधिकारी और महिला एवं बाल विकास विभाग – जिन पर प्रत्यक्ष निगरानी की जिम्मेदारी है, उन्हें जवाबदेह बनाया जाए।
3. जिला प्रशासन – यदि कोर्ट और शासन के निर्देशों का पालन नहीं हो रहा है तो यह प्रशासन की भी लापरवाही है।
आवश्यक कार्रवाई
केंद्र बंद रहने पर हितग्राहियों को वैकल्पिक व्यवस्था से पोषण आहार उपलब्ध कराया जाए।
बार-बार हड़ताल करने या अनियमित रूप से केंद्र बंद रखने वाले जिम्मेदारों पर विभागीय दंडात्मक कार्रवाई हो।
उच्च अधिकारियों की जवाबदेही तय हो और लापरवाही पर उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाए।
कोर्ट के निर्देशों के पालन हेतु जिला प्रशासन को नियमित मॉनिटरिंग रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए।
आंगनवाड़ी केंद्र केवल इमारतें नहीं हैं, बल्कि यह बच्चों की पोषण सुरक्षा और माताओं के स्वास्थ्य की गारंटी हैं। यदि ये केंद्र ही बंद रहेंगे तो इसका सीधा असर भविष्य की पीढ़ी पर पड़ेगा। शासन और न्यायालय के आदेशों के बावजूद यदि नियमों की अनदेखी की जा रही है तो यह न सिर्फ विभागीय लापरवाही, बल्कि कानूनी उल्लंघन भी है।



