22 अप्रैल – पृथ्वी दिवस। एक दिन, जब हम अपनी उसी धरती को याद करते हैं, जो हमें जीवन देती है – हवा, पानी, भोजन, छांव और भविष्य। पर क्या हम सच में इसके महत्व को समझते हैं, या यह दिन भी बाकी औपचारिक दिनों की तरह बीत जाता है?
आज हमारी धरती अपने ही बच्चों द्वारा किए गए जख्मों से कराह रही है। यह कराह उन जंगलों की है जो अब राख बन चुके हैं, उन नदियों की है जिनका पानी अब पीने लायक नहीं रहा, और उस मिट्टी की है, जो अब अन्न उगाने की ताकत खो चुकी है।
प्लास्टिक: अमरता का अभिशाप
प्लास्टिक, जिसे हमने सुविधा के नाम पर अपनाया, अब अभिशाप बन चुका है। हर साल लाखों टन प्लास्टिक समुद्रों, नदियों, खेतों और शहरों में जमा हो जाता है। इससे न केवल समुद्री जीव मर रहे हैं, बल्कि सूक्ष्म प्लास्टिक हमारे भोजन और शरीर में भी प्रवेश कर चुका है। यह पर्यावरणीय आतंक अब एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट बन गया है।

कीटनाशक: उपज के लालच में ज़हर बो रहे हम
हरित क्रांति ने खाद्य उत्पादन बढ़ाया, लेकिन साथ ही मिट्टी की सेहत को बर्बाद कर दिया। खेतों में डाले जाने वाले रासायनिक कीटनाशक और खाद अब ज़मीन को बंजर बना रहे हैं। ये ज़हर न सिर्फ मिट्टी, बल्कि हमारे पानी और शरीर में भी जा रहा है, जिससे कैंसर जैसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं।
जंगलों की कटाई: सांसों की डोर काटी जा रही है
जंगल – धरती के फेफड़े – तेजी से गायब हो रहे हैं। विकास के नाम पर पेड़ों की बलि दी जा रही है। लेकिन क्या हम भूल गए हैं कि हर पेड़ न सिर्फ ऑक्सीजन देता है, बल्कि बारिश लाने, जल संरक्षण और जैव विविधता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है? जंगल कटेंगे, तो नदियाँ सूखेंगी, बारिश घटेगी और सूखा व अकाल आम होंगे।



