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विश्व बाल श्रम निषेध दिवस पर कबीरधाम पहुंचे बाल आयोग की अध्यक्ष, पर असल हालात फिर भी जस के तस

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विश्व बाल श्रम निषेध दिवस पर एक बार फिर सरकारी तंत्र की पुरानी रवायत दोहराई गई—कागज़ी बैठकें, भाषण और वादे। छत्तीसगढ़ राज्य बाल आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने कबीरधाम में समीक्षा बैठक जरूर ली, लेकिन शहर और ग्रामीण इलाकों में आज भी छोटे-छोटे बच्चे होटलों में जूठे बर्तन धोते, ढाबों में पानी परोसते, सड़कों पर भीख मांगते और प्लास्टिक बीनते देखे जा सकते हैं। सवाल यह है कि क्या ऐसी बैठकों का कोई ठोस परिणाम निकलता भी है या यह महज़ औपचारिकता बनकर रह गई है?

 ज़मीनी सच्चाई बेहद कड़वी

बैठक में बाल श्रम, नशा, बाल संरक्षण और पुनर्वास की योजनाओं पर चर्चाएं तो हुईं, पर ज़मीनी आंकड़ों की बात करें तो स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। बीते छह महीनों में कबीरधाम जिले में बाल श्रम के 38 से अधिक प्रकरण सामने आए, लेकिन इनमें से मात्र 6 मामलों में ही कानूनी कार्रवाई की गई है। बाकी प्रकरण या तो कागज़ों में दब गए या “समझाइश” देकर रफा-दफा कर दिए गए।

विभागों में आपसी तालमेल गायब

बैठक में आयोग की अध्यक्ष ने विभागों के बीच समन्वय की ज़रूरत बताई, लेकिन सच्चाई यह है कि महिला एवं बाल विकास विभाग, पुलिस और श्रम विभाग में आपसी सहयोग की भारी कमी है। कई बार तो चाइल्डलाइन की सूचना पर भी पुलिस समय पर नहीं पहुंचती। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी बदतर है, जहां स्कूलों के शिक्षक तक बच्चा श्रमिक देखकर अनदेखा कर देते हैं।

नशे की चपेट में बचपन, कोई जिम्मेदार नहीं!

जिले में नशे की गिरफ्त में आ रहे बच्चों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन स्वास्थ्य और समाज कल्याण विभाग की ओर से कोई विशेष पुनर्वास केंद्र या अभियान नहीं चलाया जा रहा। सार्वजनिक स्थानों पर बच्चों को सॉल्युशन या नशीली दवाएं सूंघते देखा जाना आम बात हो गई है।

पंचायतों और स्कूलों की भूमिका पर भी सवाल

डॉ. शर्मा ने ग्राम पंचायतों, स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों को बाल संरक्षण गतिविधियों से जोड़ने की बात कही, लेकिन इन संस्थाओं की भूमिका वर्तमान में नगण्य है। पंचायतों को ऐसी जिम्मेदारी देने के पहले उन्हें जागरूक करने और संसाधन मुहैया कराने की जरूरत है, जो अब तक नहीं किया गया।

केवल भाषणों से नहीं होगा बदलाव

अध्यक्ष डॉ. शर्मा का वक्तव्य—”बचपन की सुरक्षा हम सबकी जिम्मेदारी है”—बेहद प्रभावशाली जरूर है, लेकिन यह बात अब केवल भाषणों तक सीमित रह गई है। जब तक हर विभाग ठोस कार्रवाई नहीं करेगा और बच्चों के अधिकारों के लिए संजीदगी से काम नहीं किया जाएगा, तब तक हर साल बाल श्रम निषेध दिवस सिर्फ औपचारिकता बनकर ही रह जाएगा।
सरकारी बैठकों और योजनाओं का उद्देश्य बच्चों को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन देना है, लेकिन कबीरधाम जैसे जिलों में यह लक्ष्य अब भी कोसों दूर है। ज़रूरत है सख्त कार्रवाई, जवाबदेही तय करने और हर स्तर पर निगरानी तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता है।

 

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