केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना जल जीवन मिशन की असल तस्वीर कबीरधाम जिले के ग्राम तरेगांव जंगल (वार्ड क्रमांक 10) में देखने को मिल रही है, जहां यह योजना जनता के जीवन को आसान बनाने की बजाय ‘जी का जंजाल’ बन गई है।
गांव के महेश झरिया के घर के पास जल जीवन मिशन के अंतर्गत बिछाई गई पाइपलाइन कई दिनों से टूटी हुई है। इससे पानी की आपूर्ति पूरी तरह बाधित हो गई है। लोगों को पीने तक का पानी समय पर नहीं मिल पा रहा है। वहीं कई गांवों में टंकियां तो बन गई हैं, पर ये सिर्फ “शोपीस” बनकर रह गई हैं — न उनमें पानी है, न उपयोग।
ठेकेदार की लापरवाही, मापदंडों की उड़ाई जा रही धज्जियां
ग्रामीणों ने बताया कि पाइपलाइन को जमीन के अंदर दबाने के बजाय उसे ऊपर ही छोड़ दिया गया है, जिससे कई जगहों पर पाइप फट गए हैं। लीकेज की समस्या आम हो चुकी है। ग्रामीणों ने कई बार ठेकेदार को इसकी शिकायत की है, लेकिन कोई समाधान नहीं हुआ। शिकायत करते-करते ग्रामीण अब थक चुके हैं। कई लोगों ने तंज कसते हुए कहा – “योजना अब भगवान भरोसे चल रही है।”
जल जीवन मिशन क्या है
जल जीवन मिशन भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण योजना है, जिसे 15 अगस्त 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य 2024 तक देश के सभी ग्रामीण परिवारों को हर घर नल से जल उपलब्ध कराना है। इसके तहत जल स्रोतों की सुरक्षा, पाइपलाइन बिछाना, नल कनेक्शन देना और गुणवत्ता की नियमित जांच शामिल है। योजना के कार्यान्वयन में पारदर्शिता, भागीदारी, और गुणवत्ता के मानकों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।
कबीरधाम में धरातलीय सच्चाई लेकिन ग्राम तरेगांव जंगल जैसी जगहों पर यह योजना अपने उद्देश्यों से भटकती दिख रही है।
नल कनेक्शन अधूरे हैं।
पाइपें खुली पड़ी हैं या टूटी हुई।
टंकियां शोपीस बनकर खड़ी हैं।
लोगों को रोजाना पानी के लिए भटकना पड़ता है।
शिकायतों के बावजूद कोई जिम्मेदार सुनवाई नहीं कर रहा।
क्या कहते हैं ग्रामीण स्थानीय निवासी रेखा नायक बताती हैं, “हमें हर दिन बर्तन लेकर दूर तक जाना पड़ता है। घर में नल है, पर पानी नहीं आता। योजना का नाम है, पर काम नहीं।”
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से सवाल
इस स्थिति ने प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि काम तय मानकों के अनुसार नहीं हुआ तो तकनीकी और वित्तीय निरीक्षण किसने किया? क्या संबंधित विभाग ने वर्क ऑर्डर और साइट विजिट की समीक्षा की?
जल जीवन मिशन जैसी योजनाएं ग्रामीण भारत के लिए वरदान साबित हो सकती हैं, बशर्ते उन्हें ईमानदारी से लागू किया जाए। कबीरधाम की स्थिति इस ओर इशारा करती है कि नियमों की अनदेखी और ठेकेदारों की मनमानी से सरकारी योजनाएं ज़मीन पर फेल हो रही हैं।
अब आवश्यकता है ठोस निरीक्षण, जवाबदेही तय करने और दोषियों पर कार्रवाई की। वरना यह योजना “हर घर जल” के बजाय “हर घर जल संकट” बन जाएगी।