सावन की अमावस्या को मनाया जाने वाला छत्तीसगढ़ का हरेली पर्व न सिर्फ प्रकृति से जुड़ा त्योहार है, बल्कि इसकी जड़ें वेद, पुराण और मौर्यकालीन परंपराओं में गहराई से समाई हुई हैं। मोतीलाल नेहरू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर प्रो. कर्मवीर धुरंधर से विशेष बातचीत में बताया कि “हरेली केवल परंपरा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की जीवित लोकसंस्कृति है।”
प्रो. धुरंधर के अनुसार अथर्ववेद के कृषि सूक्त, विष्णु पुराण के वर्षारंभ अनुष्ठान और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कृषि उपकरणों के पूजन का उल्लेख हरेली की ऐतिहासिकता को प्रमाणित करता है। मौर्य और गुप्तकाल में किसानों द्वारा हल-फावड़े और बैलों के स्नान व पूजन की परंपरा का जिक्र मिलता है। कलचुरी वंश के ताम्रपत्र भी इस पर्व के पुरातात्विक साक्ष्य हैं।
आज भी छत्तीसगढ़ के गांवों में नीम की टहनियों से घरों के द्वार सजाए जाते हैं, गेड़ी दौड़ प्रतियोगिताएं होती हैं और ओझा-गुनिया पारंपरिक सुरक्षा अनुष्ठान करते हैं। खेतों में बैलों को स्नान कर भोज दिया जाता है, कृषि यंत्रों का श्रृंगार और पूजन किया जाता है।
धार्मिक आस्था और कृषि परंपरा के संगम इस पर्व को ‘धरती के हरियाली का उत्सव’ बना देते हैं। प्रो. धुरंधर का कहना है कि “हरेली जैसे पर्व भारत की असली पहचान को बचाए रखने की पुकार हैं — जो प्रकृति, परंपरा और किसान के मूल्यों से जुड़ी है।”
शहरीकरण के इस दौर में हरेली भारत की सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखने वाला पर्व है, जो न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश के लिए प्रकृति और परंपरा से जुड़ने का संदेश देता है।