कबीरधाम जिले के पंडरिया क्षेत्र में सेमरहा कांड की भयावह यादें आज भी लोगों के जेहन में ताज़ा हैं। उस हादसे ने कई परिवारों की दुनिया उजाड़ दी थी, लेकिन अफसोस… सिस्टम ने उससे कुछ भी नहीं सीखा।
दूसरे ही वर्ष सरोदा डेम के पास फिर एक वाहन पलट गया, जिसमें कई लोगों की असमय मौत हो गई। किसी ने अपने माता-पिता खोए, किसी ने पति, तो किसी ने बेटा-बहू—लेकिन प्रशासन की आंखें अब भी बंद हैं।
हैरानी की बात यह है कि मालवाहक वाहनों में सवारी ढोने का गैरकानूनी खेल आज भी बदस्तूर जारी है। ये वाहन नगर क्षेत्र, पुलिस थाना और पुलिस कर्मियों के सामने से खुलेआम गुजर रहे हैं, लेकिन न चालान, न कार्रवाई, न रोक-टोक।
प्रश्न उठता है—क्या हादसे का इंतजार किया जा रहा है ।
मोटरयान अधिनियम 1988 की धारा 66, 177, 184, 194 और 192A के तहत मालवाहक वाहनों में सवारी ले जाना सीधे तौर पर अपराध है। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ हादसे के बाद सहानुभूति जताने मौके पर पहुंचते हैं, लेकिन हादसा रोकने की जिम्मेदारी निभाने से पहले ही गायब हो जाते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सेमरहा कांड के बाद सख्ती से नियमों का पालन कराया गया होता, तो सरोदा डेम जैसी घटनाएं नहीं होतीं।
आज सवाल सिर्फ कानून का नहीं, जवाबदेही का है—
क्या यातायात पुलिस की नियमित चेकिंग हो रही है।
क्या थाना प्रभारियों की जिम्मेदारी तय की जा रही है ।
या फिर मौत के बाद दो मिनट का मौन ही प्रशासन की नीति बन गई है।
जब तक जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक कबीरधाम की सड़कों पर मालवाहक नहीं, मौत दौड़ती रहेगी।