जिले के वनांचल में संजोई गई बैगा समुदाय की पारंपरिक कला अब बेंगलुरु तक अपनी पहचान बना रही है। जिले की बैगा महिला उद्यमी श्रीबाई बैगा अपने हाथों से तैयार पारंपरिक बीरन माला और अन्य आभूषणों का प्रदर्शन अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में आयोजित प्रदर्शनी में कर रही हैं। उनकी यह सहभागिता न केवल बैगा समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को व्यापक पहचान दिला रही है, बल्कि पारंपरिक हुनर को आजीविका और महिला उद्यमिता से जोड़ने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। खास बात यह है कि बेंगलुरु तक का उनका सफर पहली रेल यात्रा भी है।
पारंपरिक बीरन माला में झलकती बैगा संस्कृति
बैगा समुदाय अपनी विशिष्ट परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक ज्ञान के लिए जाना जाता है। विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) में शामिल इस समुदाय की विरासत को सहेजने में श्रीबाई बैगा अपने हुनर के माध्यम से योगदान दे रही हैं। उनके हाथों से तैयार बीरन माला और पारंपरिक आभूषणों में स्थानीय शिल्पकला तथा बैगा संस्कृति की झलक दिखाई देती है। बिरन के माध्यम से वे अपने पारंपरिक कौशल को आजीविका से जोड़कर आगे बढ़ रही हैं।
पहली रेल यात्रा से राष्ट्रीय मंच तक का सफर
श्रीबाई बैगा के लिए बेंगलुरु पहुंचना केवल एक शहर से दूसरे शहर तक की यात्रा नहीं, बल्कि अपने हुनर को व्यापक पहचान दिलाने का अवसर है। पहली बार रेल यात्रा कर बेंगलुरु पहुंचीं श्रीबाई अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित प्रदर्शनी में अपने हस्तनिर्मित आभूषणों का प्रदर्शन कर रही हैं। इस मंच के माध्यम से उन्हें अपने उत्पादों की विशेषता लोगों तक पहुंचाने, संभावित ग्राहकों से जुड़ने और नए बाजारों तक पहुंच बनाने का अवसर मिल रहा है।
बिरन से पारंपरिक हुनर को मिल रहा आजीविका का आधार
बिरन पारंपरिक ज्ञान, आदिवासी हस्तशिल्प और स्थानीय कौशल को आजीविका एवं उद्यमिता के अवसरों से जोड़ने की पहल है। इसके माध्यम से पारंपरिक शिल्प से जुड़ी महिलाओं को अपने उत्पादों के प्रदर्शन और बाजार तक पहुंच बनाने का अवसर मिल रहा है। श्रीबाई बैगा की सहभागिता इस बात का उदाहरण है कि स्थानीय स्तर पर संरक्षित पारंपरिक कला को उचित मंच मिलने पर व्यापक पहचान दिलाई जा सकती है।
महिला उद्यमिता और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा
श्रीबाई बैगा की यह उपलब्धि बैगा समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ ही आदिवासी महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण की संभावनाओं को भी सामने लाती है। पारंपरिक आभूषणों के निर्माण और प्रदर्शन के माध्यम से वे अपने कौशल को आजीविका का आधार बना रही हैं। उनका यह सफर वनांचल की उन महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जिनके पास पारंपरिक हुनर तो है, लेकिन उसे व्यापक पहचान दिलाने के अवसर सीमित हैं। कवर्धा की बीरन माला का बेंगलुरु तक पहुंचना स्थानीय कला, महिला उद्यमिता और सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दिलाने की दिशा में एक सकारात्मक पहल है।