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सघन कुसुमी लाख खेती को बढ़ावा देने के लिए ग्रामीणों को उपलब्ध कराए गए 774 किलोग्राम कुसुमी बीहन

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कवर्धा, वनमंडल कवर्धा के कार्यक्षेत्र अन्तर्गत लाख पालन के लिए उपयुक्त कुसुम वृप्रचुर मात्रा में विद्यमान है। उन्नत तकनीक के अभाव के कारण काफी कम लाख उत्पादन हो रहा था। वन मंडलाधिकारी श्रीचूड़ामणि सिंह के मार्गदर्शन में परंपरागत तरीके से हो रही लाख पालन कार्य में सुधार करते हुए उन्नत वैज्ञानिक तरीके से लाख पालन कार्य को बढ़ावा देने के उद्देश्य से चयनित ग्रामों में इच्छुक ग्रामीणों के स्व-सहायता समूह बनाकर बेहतर परिणाम प्राप्त करने का प्रयास किया गया। वनमंडल कवर्धा के पंडरिया पश्चिम परिक्षेत्र के पुटपुटा, बोहिल, राहीडांड, बांगर, कोटनापानी, रूखमीदादर, ढ़ोढ़र, ताइतिरनी, सेजाडीह, बदनाचुवा, तेलीयापानी, भेलवानकान, भाकुर, छिंदीडीह, देवानपटपर, बोहिल तथा अरचरा 20 ग्रामों के 400 सदस्यों के पास उपलब्ध कटाई-छंटाई वाले कुसुम वृक्षों का सर्वेक्षण किया गया। ग्रामीणों में अधिकांशतः पिछड़े एवं गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग के पाए गए इनके पास वृक्ष है परंतु वृक्षों में लाख बीहन चढ़ाने के लिए आवश्यक लाख बीहन की कमी पाई गई। उन्होंने बताया कि सघन कुसुमी लाख खेती को बढ़ावा देने के लिए ग्रामीणों को 774 किलोग्राम कुसुमी बीहन उपलब्ध कराए गए है।
वन मंडलाधिकारी श्री चूड़ामणि सिंह ने बताया कि लाख एक प्राकृतिक राल है, जो कि मुख्यतः मादा केरिया लाक्का कीट के द्वारा मुख्य रूप से प्रजनन के पश्चात स्त्राव के फलस्वरूप बनता है। लाख कीट के दो नस्ल होती है। जिन्हें कुसुमी और रंगीनी कहते हैं। कुसुमी लाख कुसुम एवं बेर वृक्षों पर रंगीनी लाख, पलास, बेर, पीपल वृक्षों पर मुख्य रूप से कुसुम किया जाता है, यह फसल वर्ष में दो बार लिया जाता है। दोनों प्रकार में कुसुमी लाख उत्तम मानी जाती है। जिसका मूल्य बाजार मूल्य रंगीनी के तुलना में अधिक होता है। उन्होंने बताया कि लाख एक प्राकृतिक उत्पाद है तथा वर्तमान में प्राकृतिक उत्पादों की मांग बढ़ती जा रही है। विशेषज्ञों द्वारा यह अनुमान लगाया जा रहा है कि भविष्य में लाख आधारित उत्पादों की मांग और अधिक होगी जिससे भविष्य में लाख क्षेत्र में रोजगार के अवसर अधिक प्राप्त होंगें।
कुसुमी बीहन व्यवस्था
जिले में सघन कुसुमी लाख खेती को बढ़ावा देने के लिए 20 ग्रामों के 350 कृषकों (लाख) को विगत तीन माह से लगातार लाख पालन की वैज्ञानिक पद्धति से अवगत कराया गया। उनकी समस्याओं को सूचीबद्ध किया गया। ग्रामीणों ने बताया कि विगत दो वर्षों से कुसुमी बीहन (बीज) प्राप्त नहीं हो रहा है। इस कारण लाख खेती नहीं कर पा रहे है। जिला यूनियन कवर्धा के जूनियर एक्सीक्यूटिव तथा 05 वन धन मित्रों को भानुप्रतापपुर जिले के किरानी (आसुलखार) भेज कर कुसुमी लाख विकास प्रशिक्षण दिलाया गया। लाख एक्सीक्यूटिव संजय पटेल से लाख कृषकों को लाख पालन की वैज्ञानिक पद्धति से अवगत कराया गया। कुसुमी लाख बीहन की व्यवस्था गरियाबंद जिले के देवभोग एवं मैनपुर से क्रमशः 4.55 क्विंटल तथा 3.19 क्विंटल लाख बीहन क्रय कर कृषकों तक पहुंचाया गया।
वितरण व्यवस्था
वन मंडलाधिकारी ने बताया कि बीहन लाख प्राप्त होने पर एक टब में पानी डालकर फफुंद नाशक व कीट नाशक दवाई डाल कर बीहन को उपचारित किया गया, तत्पश्चात् प्रत्येक कृषक को मांग अनुसार 100-100 ग्राम के बीहन पैकट जाली में बंधवाकर प्रदाय किए गए। बीहन कटाई के पश्चात् 48 घंटे के अंदर बीहन पोषक वृक्षों में चढ़वाए गए।
फसल संरक्षण
लाख कीटों को लाख चिटियों से खतरा नहीं होता है, लेकिन काली चिटों से खतरा रहता है तथा कुसुम पोषक वृक्ष जिस पर बीहन चढ़ाया गया है, के तनों पर डामर पोतने की समझाइस दी गई। शत्रु कीट काली तितली तथा सफेद तितली से बचाने के लिए फफूंदनाशक एवं कीटनाशक का प्रत्येक 30 दिन पश्चात् दो बार छिड़काव करने की समझाइस दी गई।
फसल कटाई
कृषकों को लाख बीहन चढ़ाई के 21 दिन पश्चात् फूकी लाख एकत्र कर बिक्रि करने तथा 06 माह पश्चात् छिली लाख एकत्र करने के निर्देश दिए गए।
विक्रय
प्रत्येक लाख कृषक को उनके द्वारा लगाए गए बीहन की मात्रा से 5 गुना लाख उपलब्ध होगी। इस प्रकार वर्तमान में 774 किलोग्राम लाख बीहन के विरूद्ध 3870 किलोग्राम लाख की पैदावार होगी जिसको राज्य लघु वनोपज संघ 300 रूपए प्रति किलोग्राम की दर से क्रय करेगा।
लाभ
उन्होंने बताया कि इस प्रकार 350 कृषकों (लाख) को लगभग 11 लाख रूपए प्राप्त होंगें तथा शुद्ध लाभ लगभग 08 लाख 51000.00 रूपए होगी। उल्लेखनीय है कि लाख का उपयोग भारतवर्ष में वैदिक काल से किया जा रहा है। अथर्ववेद में लक्ष्शा के रूप में वर्णन किया गया है। लाख का उपयोग पुराने समय में मुख्यतः सिल्क की साड़ियों को रंगने, महिलाओं द्वारा हाथ एवं पैरों को सजाने, रंगने, जेवरात, चुड़ियां दवाइयां बनाने तथा लकड़ियों को रंगने के लिए उपयोग किए जाते थे। वर्तमान में उपरोक्त के अतिरिक्त परफ्यूम उद्योग, फर्नीचर पालीश, गेस्केट शेलाक, इनस्यूलेटिन वार्नीश, वेवरेज उद्योग,उलन एवं सिल्क कपड़े रंगने, तथा दवाइयां में निर्माण हो रहा है।
                                                    -भुवन पटेल 

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