BP NEWS CG
Breaking Newsकवर्धाबड़ी खबरसमाचारसिटी न्यूज़

भगवान भरोसे आमापानी की आंगनवाड़ी: राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों के हक़ पर डाका

Flex 10x20 new_1
previous arrow
next arrow
कवर्धा
कबीरधाम जिले के घने जंगलों के बीच बसे ग्राम आमापानी की तस्वीर आज भी विकास से कोसों दूर है। ग्राम पंचायत बोककरखार के अंतर्गत आने वाला यह आश्रित ग्राम विशेष पिछड़ी जनजातियों का निवास स्थल है। इन्हीं समुदायों को भारत सरकार ने “राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र” का दर्जा दिया है—ताकि उन्हें विशेष संरक्षण और संवेदनशील सहयोग मिल सके।
लेकिन हकीकत यह है कि यहां की आंगनवाड़ी केंद्र खुद भगवान भरोसे चल रही है। सरकार की योजनाएं और प्रशासन की जिम्मेदारियां कागजों में दर्ज हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत गांववालों की आवाज़ में चीख-चीखकर लापरवाही की कहानी कह रही है।
आंगनवाड़ी केंद्र सिर्फ नाम का, काम कुछ नहीं
एकीकृत बाल विकास परियोजना चिल्फी के अंतर्गत संचालित आंगनवाड़ी केंद्र आमापानी में न तो समय पर केंद्र खुलता है, न बच्चों को पोषण मिलता है और न ही कोई नियमित गतिविधि होती है। कार्यकर्ता 5 किलोमीटर दूर पंचायत मुख्यालय से आती हैं, लेकिन गांववालों के मुताबिक, उनकी उपस्थिति “जब मन हो तब” तक सीमित रहती है।
ग्रामीणों का कहना है,
“हफ्तों तक केंद्र नहीं खुलता। बच्चे बाहर खेलते रहते हैं और पोषण आहार की बाट जोहते हैं।”
यह हाल तब है जब इसी केंद्र के जरिए शिशुओं, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं को सरकारी पोषण योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए।
भवन की हालत खंडहर जैसी, बच्चों की जान जोखिम में
आंगनवाड़ी भवन की हालत किसी खंडहर से कम नहीं है। दीवारों में गहरी दरारें, टपकती छतें और फर्श पर फैली गंदगी—यह सब मिलकर एक ऐसे माहौल का निर्माण करते हैं, जो बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य दोनों के लिए खतरा है। बारिश के दिनों में भवन पूरी तरह अनुपयोगी हो जाता है।ग्रामीणों की चिंता है:कभी भी छत गिर सकती है। हम अपने बच्चों को वहां भेजने से डरते हैं, लेकिन विकल्प भी नहीं है।”
निरीक्षण की खानापूर्ति: ज़िम्मेदार अधिकारी भी लापरवाह
गांववालों का यह भी आरोप है कि जिन अधिकारियों पर नियमित निरीक्षण की जिम्मेदारी है, वे सिर्फ रजिस्टर में हस्ताक्षर करके चले जाते हैं। ना कोई संवाद होता है, ना कोई सुधारात्मक कदम।
यह महज एक लापरवाही नहीं, बल्कि संविधान प्रदत्त अधिकारों और योजनाओं की खुलेआम अवहेलना है। राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र माने जाने वाले इन बच्चों को जिस संवेदना और प्राथमिकता से देखा जाना चाहिए, वह पूरी तरह नदारद है।
पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य से वंचित बचपन
जिस उम्र में बच्चों को पढ़ने, खेलने और पौष्टिक भोजन से पोषण मिलने की जरूरत होती है, उस उम्र में आमापानी के बच्चे भूख, उपेक्षा और अनिश्चितता से जूझ रहे हैं।
सरकार के “सुपोषण अभियान”, “सक्षम आंगनवाड़ी योजना”, “पोषण ट्रैकर ऐप” जैसी योजनाएं यहां केवल पोस्टर और बोर्ड पर ही सीमित हैं।
जनजातीय सम्मान और राष्ट्रीय गरिमा पर चोट
जब भारत के राष्ट्रपति किसी समुदाय को “दत्तक पुत्र” का दर्जा देते हैं, तो वह केवल एक संवैधानिक औपचारिकता नहीं होती, बल्कि उसके पीछे एक राष्ट्रव्यापी नैतिक और सामाजिक प्रतिबद्धता होती है। आमापानी जैसे गांवों में व्याप्त बदइंतजामी और लापरवाही इस गरिमा पर सीधा हमला है।
ग्रामीणों की मांगें और उम्मीदें
थक चुके ग्रामीण अब प्रशासन से ठोस कार्रवाई की मांग कर रहे हैं:
1. आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए।
2. भवन की तत्काल मरम्मत या नया भवन बनाया जाए।
3. नियमित पोषण, स्वास्थ्य जांच और शिक्षा गतिविधियां शुरू हों।
4. जिम्मेदार अधिकारियों का निरीक्षण पारदर्शी और जवाबदेह हो।
5. सरकार जनजातीय बच्चों के साथ किया गया वादा निभाए।
आमापानी की तस्वीर देश के उन हिस्सों की भी है, जिन्हें विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए करोड़ों की योजनाएं बनाई जाती हैं। लेकिन जब तक ज़मीनी क्रियान्वयन, पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं होगी, तब तक ये योजनाएं केवल फाइलों की शोभा बनी रहेंगी।
अब वक्त आ गया है कि प्रशासन अपने दायित्वों को समझे और आमापानी जैसे गांवों को अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने में अपनी भूमिका निभाए

IMG-20250710-WA0006
previous arrow
next arrow

Related posts

छत्तीसगढ़ में मंत्रियों को मिला विभागीय बंटवारा, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपने पास रखे अहम मंत्रालय

Bhuvan Patel

ब्रेकिंग* *उपमुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा की पहल पर आज जेलों में कैदियों का गंगा जल स्नान कराया गया*

Bhuvan Patel

कबीरधाम जिले में भ्रष्टाचारियो से वसूली के बजाए दिया जाता है संरक्षण 

Bhuvan Patel

Leave a Comment

error: Content is protected !!