कबीरधाम जिले में बढ़ती चोरी की घटनाएं अब एक सामान्य अपराध नहीं रह गई हैं, बल्कि इसके पीछे छिपा है एक सुनियोजित अवैध कारोबार—कबाड़ियों का नेटवर्क, जो चोरी का सामान खरीदकर अपराध को परोक्ष रूप से बढ़ावा दे रहा है।
जिला मुख्यालय से लेकर नेशनल हाईवे, ब्लॉक मुख्यालयों और ग्रामीण अंचलों तक, कबाड़ का यह धंधा बेरोकटोक फैलता जा रहा है। सबसे हैरानी की बात यह है कि यह सब कुछ पुलिस की नाक के नीचे हो रहा है, लेकिन कार्यवाही नदारद है। यह लापरवाही प्रशासनिक व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।
चोरी और कबाड़: एक अनचाही साझेदारी
चोरों के लिए ये कबाड़ी किसी वरदान से कम नहीं। नशे और शराब की लत में डूबे युवा, पैसे की तलाश में छोटी-बड़ी चोरी करते हैं और उनका पहला ठिकाना बनते हैं ये कबाड़ी दुकानदार। यहां उन्हें तुरंत नगद पैसे मिल जाते हैं, और चोरी का माल कबाड़ के ढेर में मिलाकर आसानी से गायब कर दिया जाता है। न तो पहचान, न ही कोई हिसाब-किताब।
गांव-गांव तक फैला नेटवर्क
यह अवैध कारोबार केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। अब तो यह गांव-गांव तक अपनी जड़ें जमा चुका है। हर छोटे-बड़े गांव में एक-दो कबाड़ी मिल ही जाते हैं, जो चोरी का माल खरीदने में तनिक भी हिचकिचाते नहीं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में भी चोरी की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।
प्रशासनिक चुप्पी: आखिर क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि कबीरधाम पुलिस इस पूरे नेटवर्क पर कार्यवाही क्यों नहीं कर रही? क्या यह लापरवाही है, या फिर कहीं न कहीं मिलीभगत? क्या प्रशासन इन कबाड़ियों की भूमिका को नजरअंदाज कर रहा है? अगर समय रहते इस पर सख्त कार्यवाही नहीं हुई, तो आने वाले समय में यह समस्या और भी गंभीर रूप ले सकती है।
समाधान की दिशा में कदम जरूरी
प्रशासन को तत्काल विशेष अभियान चलाकर सभी कबाड़ी दुकानों की जांच करनी चाहिए।
चोरी के मामलों में कबाड़ियों की भूमिका की गहन पड़ताल होनी चाहिए।
स्थानीय लोगों को भी सतर्क रहकर ऐसे अवैध कारोबार की सूचना पुलिस को देनी चाहिए।
नशे के खिलाफ जागरूकता और पुनर्वास केंद्रों की स्थापना से अपराधों में कमी लाई जा सकती है।