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मनरेगा का शर्मनाक सच: 14.42 लाख का पंचायत भवन बना खंडर, नशाखोरी का अड्डा—प्रशासन मौन

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महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के नाम पर ग्रामीण विकास के दावों की पोल ग्राम पंचायत परसाभदेर (च) में पूरी तरह खुल चुकी है। वर्ष 2020 में स्वीकृत 14.42 लाख रुपये की लागत से बनने वाला नवीन पंचायत भवन आज तक अधूरा पड़ा है और अब यह भवन खंडर में तब्दील होकर नशाखोरी का अड्डा बन चुका है।

नागरिक सूचना पटल पर दर्ज जानकारी के अनुसार कार्य का यूनिक कोड 3316003105/AV/1111379702 है। कार्य प्रारंभ तिथि 30 जून 2020 दर्ज है, लेकिन पूर्णता तिथि आज तक नहीं। दस्तावेज़ों में कार्य को लगभग 80 प्रतिशत पूर्ण दिखाया गया, जबकि ज़मीनी हकीकत यह है कि भवन उपयोग लायक तो दूर, अब सामाजिक असुरक्षा का केंद्र बन गया है।

753 मानव दिवस, 1.43 लाख श्रमिक लागत—तो गया पैसा कहाँ
इस कार्य के लिए 753 मानव दिवस और ₹1.43 लाख श्रमिक लागत दर्शाई गई है। श्रमिक दर ₹190 प्रतिदिन तय थी। सवाल यह है कि जब मजदूरी और सामग्री पर भुगतान हुआ, तो फिर भवन पूरा क्यों नहीं हुआ ।

क्या राशि का दुरुपयोग हुआ।

क्या फाइलों में काम पूरा दिखाकर भुगतान निकाल लिया गया।

अधिकारियों की कॉलोनी सामने, फिर भी कोई देखने नहीं आता
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह ग्राम पंचायत जिला मुख्यालय से मात्र छठा हुआ गांव है और भवन के ठीक सामने अधिकारियों की आवासीय कॉलोनी मौजूद है। इसके बावजूद वर्षों से कोई अधिकारी “झांकने तक” नहीं पहुंचा।

यह लापरवाही नहीं, बल्कि संरक्षण में पल रहा भ्रष्टाचार प्रतीत होता है।

मनरेगा—रोजगार नहीं, भ्रष्टाचार की गारंटी

जिस योजना का उद्देश्य ग्रामीणों को रोजगार और गांवों को आधारभूत ढांचा देना था, वही योजना यहां भ्रष्टाचार, लापरवाही और प्रशासनिक संवेदनहीनता की भेंट चढ़ गई है।

जिम्मेदार कौन

निर्माण एजेंसी: ग्राम पंचायत परसाभदेर (च)
तकनीकी सहायक : अवनी दीवान
कार्यक्रम अधिकारी: विजया लक्ष्मी

अब सवाल यह नहीं कि भवन क्यों अधूरा है,
सवाल यह है कि कब होगी जिम्मेदारों पर कार्रवाई।
और क्या मनरेगा सिर्फ कागजों में ही “महात्मा गांधी” के नाम पर चलती रहेगी।

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