देश आजादी के 80वें वर्ष का जश्न मना रहा है। तिरंगा शान से लहरा रहा है, मंचों से विकास और सुशासन के दावे गूंज रहे हैं। लेकिन कबीरधाम के गांव, वनांचल और दूरस्थ इलाकों की तस्वीर देखकर कुर्सी के कान फिर खड़े हो गए हैं। सवाल सीधा है—आजादी का अमृतकाल आ गया, लेकिन सुविधाओं का अकाल आखिर कब खत्म होगा?
कबीरधाम की राजनीतिक ताकत किसी परिचय की मोहताज नहीं। डॉ. रमन सिंह तीन कार्यकाल यानी 15 वर्ष मुख्यमंत्री रहने के बाद वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष हैं। कवर्धा विधायक विजय शर्मा उपमुख्यमंत्री के साथ गृह, जेल एवं पंचायत जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाल रहे हैं। पंडरिया विधायक भावना बोहरा को विधानसभा में उत्कृष्ट विधायक के सम्मान से नवाजा जा चुका है। जिले से दो सांसद भी हैं। यानी राजनीतिक नेतृत्व की कमी तो यहां दूर-दूर तक नहीं है।
इसके बावजूद जिला मुख्यालय से लेकर गांव और वनांचल तक शुद्ध पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी योजनाओं की वास्तविक पहुंच जैसे सवाल आज भी मुंह बाए खड़े हैं। चिल्फी-झालमला क्षेत्र में हर वर्ष मलेरिया जैसी बीमारी की चुनौती सामने आती है। बीमारी आती है, आंकड़े बनते हैं, बैठकें होती हैं और फिर व्यवस्था अगले मौसम का इंतजार करने लगती है।
कुर्सी के कानों को सबसे ज्यादा हैरानी तब होती है, जब आजादी के जश्न के लिए मंच तो सज जाता है, लेकिन उसी कार्यक्रम में बच्चों को जरूरी सुविधाओं के लिए परेशान होना पड़ता है। आखिर स्वतंत्रता दिवस का उत्सव केवल भाषणों और झंडों तक सीमित क्यों रहे?
भ्रष्टाचार की शिकायतें भी लगातार चर्चा में हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंचने में अटक जाए तो फाइलें शायद एक-दूसरे से कहती होंगी—“हम तो चल रही हैं, जनता ही इंतजार कर रही है।”
कबीरधाम में सत्ता के बड़े चेहरे हैं, विकास के दावे हैं और योजनाओं की लंबी सूची भी है। फिर भी यदि आम आदमी को पानी, इलाज, शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़े तो कुर्सी के कानों में सवाल उठना लाजिमी है।
80 साल की आजादी के बाद अब जनता सिर्फ यह नहीं पूछ रही कि देश कितना आगे बढ़ा, बल्कि यह भी पूछ रही है कि उसके गांव तक विकास कब पहुंचेगा।